गुप्त काल और साम्राज्य/ Gupt vansh Vikramaditya Empire History in Hindi

Gupt vansh Vikramaditya Empire History in Hindi

गुप्त काल और साम्राज्य/ Gupt vansh Vikramaditya Empire History in Hindi

कुषाण साम्राज्य के विघटन के पश्चात जिस विकेंद्रीकरण के युग का प्रारंभ हुआ वह चतुर्थ शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ तक चलता रहा.

पश्चिम पंजाब में कुषाण वंश का शासन था तथापि पूरब की ओर उसका कोई प्रभाव नही था.

गुजरात तथा मालवा के पश्चिम भाग में शक अभी सक्रिय थे, परंतु उनकी शक्ति का उत्तरोत्तर हास होता जा रहा था. उत्तरी भारत के शेष भू-भाग में इस समय अनेक राज्यों व गणराज्यों का शासन था.

यह काल किसी महान सेनानायक की महत्त्वकांक्षाओं की पूर्ती के लिए सर्वाधिक सुनहरा अवसर प्रस्तुत कर रहा था. फलस्वरूप मगध के गुप्त राजवंश में ऐसे महान सेनानायकों का उदय हुआ.

 

1). श्रीगुप्त

गुप्त सेना के पूर्व में स्थित ताम्रपत्र अभिलेख में भी गुप्त का उल्लेख गुप्त वंश के आदिराज के रूप में किया गया है. लेखों में इसका गोत्र धारण बताया गया है. इनका शासन काल 240 से 280 ई. तक रहा.

श्रीगुप्त ने महाराज की उपाधि धारण की. इत्सिंग के अनुसार श्रीगुप्त ने मगध में एक मंदिर का निर्माण करवाया तथा मंदिर के लिए 24 गॉव दान में दिए थे.

इसके द्वारा धारण की गयी उपाधि महाराज सामंतों द्वारा धारण की जाती थी, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि श्रीगुप्त किसी शासक के अधीन शासन करता था.

 

2). घटोत्कच गुप्त

लगभग 280 ई. में श्रीगुप्त ने घटोत्कच को अपना उत्तराधिकारी बनाया. इसने भी महाराज की उपाधि धारण की.

प्रभावती गुप्त के पूना व रिधपुर ताम्रपत्र अभिलेखों में घटोत्कच को गुप्त वंश का प्रथम राजा बताया गया है.

इसका राज्य सम्भवत मगध के समीवर्ती क्षेत्र तक ही सीमित था. उसने लगभग 319 ई. तक शासन किया.

 

3). चंद्रगुप्त- I

गुप्त वंश का प्रथम वास्तविक संस्थापक शासक था. घटोत्कच के पुत्र चंद्रगुप्त प्रथम ने गुप्त साम्राज्य की नींव डाली.

गुप्त साम्राज्य का प्रथम स्वतंत्र शासक जिसने महाराजधिकार की उपाधि धारण कर उन्होंने पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया. चंद्रगुप्त प्रथम ने 319 ई. में गुप्त संवत की स्थापना की जिसका उल्लेख मथुरा अभिलेख में मिलता है.

चंद्रगुप्त प्रथम शासक था जिसने सोने का सिक्का चलवाया जिसके एक ओर चंद्रगुप्त- कुमारदेवी का चित्र व दूसरी ओर लक्ष्मी का चित्र अंकित था. चंद्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया था.

चंद्रगुप्त प्रथम के पश्चात उसका पुत्र समुद्रगुप्त शासक बना.

गुप्त काल और साम्राज्य/ Gupt vansh Vikramaditya Empire History in Hindi

 

4). समुद्रगुप्त

समुद्रगुप्त, गुप्त वंश का एक महान योद्धा तथा कुशल सेनापति था. इसी कारण उसे विसेंट आर्थर स्मिथ ने अपनी अलीं हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया में समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा था. सम्राट अशोक शान्ति व अनाक्रमण नीति में विश्वास करता था तो समुद्रगुप्त हिसा व विजय में विश्वास करता था.

समुद्रगुप्त का साम्राज्य पूर्व में ब्रह्पुत्र, दक्षिण में नर्मदा तथा उत्तर में कश्मीर की तलहटी तक विस्तृत था. प्रयाग प्रशसित की 19 वीं व 20 वीं पंक्तियों में दक्षिणापथ विजय का उल्लेख है. कुल 12 शासकों को हराया था. अंतिम शासक दक्षिण के कांचों का पल्लव वंश का विष्णुगोप था.

समुद्रगुप्त की दक्षिणापथ विजय की 3 मुख्य नीतियाँ थीं. समुद्रगुप्त की म्रत्यु के बाद रामगुप्त कमज़ोर शासक हुआ उनके काल में उनकी पत्नी ध्रुवस्वामिनी देवी को प्राप्त करने के लिए शकों ने आक्रमण किया. छोटे भाई चंदगुप्त विक्रमादित्य ने भाई रामगुप्त की ह्त्या कर ध्रुवस्वामिनी देवी के साथ स्वयं शादी कर गद्दी पर बैठा.

 

5). चंद्रगुप्त- II (विक्रमादित्य)

 

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चंद्रगुप्त द्वितीय के शांसनकाल में गुप्त साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो गया था. चंद्रगुप्त का साम्राज्य पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में हिमालय की तलहटी से दक्षिण में नर्मदा नदी तक विस्तृत था. चंद्रगुप्त द्वितीय का काल साहित्य और कला का स्वर्ण युग कहा जाता है. इसने रजत मुद्राओं का सर्वप्रथम प्रचलन करवाया था. चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में 9 रत्न थे. चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के पश्चात उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम गुप्त साम्राज्य का शासक बना.

 

वैवाहिक संबंध

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने वैवाहिक संबंधों और विजयों के द्वारा अपने साम्राज्य की सीमा बढाई थी. विक्रमादित्य ने नागराजकुमारी कुबेरनागा से विवाह किया और उससे एक कन्या प्रभावती गुप्त उत्पन्न हुई.

वाकाटक लोग आधुनिक महाराष्ट्र प्रांत में शासन करते थे. वाकाटकों का सहयोग प्राप्त करने के लिए चंदगुप्त ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह नरेश रूद्रसेन दितीय के साथ कर दिया.

कदम्ब राजवंश के लोग कुंतल में शासन करते थे. तालगुंड अभिलेख से पता चलता है कि इस वंश के एक शासक काकुत्सवर्मन ने अपनी एक पुत्री का विवाह चंद्रगुप्त दितीय के पुत्र कुमारगुप्त प्रथम से कर दिया.

 

6). कुमारगुप्त- I

उसके स्वर्ण सिक्कों पर उसे गुप्तकुलामल चन्द्र व गुप्तकुल व्योमशाशि कहा गया है. शक्रादित्य को कुमारगुप्त की उपाधि महेन्द्रादित्य का समानार्थी माना गया है. कुमारगुप्त की मुद्राओं में गरुड़ के स्थान पर मयूर की आकृति अंकित की गयी.

कुमारगुप्त ने अश्वमेघ यज्ञ किया तथा अश्वमेघ प्रकार की मुद्रा चलाई. कुमारगुप्त प्रथम के शासन काल में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी थी.

 

7). स्कंदगुप्त

 

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स्कंदगुप्त गुप्त वंश का अंतिम प्रतापी शासक था. हूणों का गुप्त पर आक्रमण स्कंदगुप्त के शासनकाल की महत्वपूर्ण घटना थी. श्वेत हूणों को पूर्वी हूण भी कहा जाता है, जिन्होंने हिंदू कुश पार कर गांधार प्रदेश कब्ज़ा कर गुप्त साम्राज्य का अभियान पूरा किया.

सौराष्ट्र के गवर्नर पर्यटन के पुत्र चक्र्गणित ने सुदर्शन झील के तट पर विष्णु मूर्ति भी स्थापित कराई थी.

 

स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारी

पुरुगुप्त

यह कुमारगुप्त प्रथम का ही पुत्र तथा स्कंद्पुत्र का सौतेला भाई था. संभवत स्कंदगुप्त संतानहीन था और उसके बाद सत्ता पुरूगुप्त के हाथों में आयी. चूँकि वह वृधावस्था में राजा हुआ, अत उसका शासन अल्पकालीन रहा. उसके समय में गुप्त साम्राज्य की अवनति प्रारंभ हो गयी थी.

कुमारगुप्त दितीय

पुरूगुप्त का उत्तराधिकारी कुमारगुप्त दितीय हुआ. सारनाथ से गुप्त संवत 154 का उसका लेख मिलता है जो बौद्ध प्रतिभा पर खुदा हुआ है. यह निश्चित रूप से पता नही कि वह स्कंदगुप्त का पुत्र था.

सारनाथ लेख में भूमि रक्षित कुमारगुप्ते उत्कीर्ण मिलता है. उल्लेखनीय है कि यहाँ कुमारगुप्त को महाराज भी नही कहा गया है.

गुप्त काल और साम्राज्य/ Gupt vansh Vikramaditya Empire History in Hindi

 

बुधगुप्त

कुमारगुप्त दितीय के बाद बुधगुप्त शासक हुआ. प्रारंभ में विद्वानों का विचार था कि वह कुमारगुप्त का पुत्र था क्योंकि ह्वेनसांग उसके पिता का नाम शक्रादित्य बताता है, किंतु नालंदा से उसकी मुहर प्राप्त हो जाने के बाद यह सिद्ध हो गया कि वह पुरूगुप्त का पुत्र था.

सारनाथ के अतिरिक्त मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित एरण से भी उसका स्तंभ लेख मिला है. उत्तरी बंगाल के दामोदरपुर तथा पहाडपुर से उसके ताम्रपत्र मिलते हैं, इसमें गुप्त संवत की तिथियाँ दी गयी हैं. इसके अतिरिक्त उसकी कुछ रजत मुद्राएँ भी प्राप्त हुई हैं.

स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारियों में बुधगुप्त सबसे अधिक शक्तिशाली राजा था जिसने एक विस्तृत प्रदेश पर शासन किया. स्वर्ण मुद्राओं पर उपाधि श्रीविक्रम मिलती है. उसके अभिलेखों से उसके कुछ प्रांतीय पदाधिकारियों की सुचना मिलती है.

बुधगुप्त बौद्धमतानुयायी था, जैसा कि चीनी यात्री ह्येंसांग के विवरण से पता चलता है. उसके नालंदा महाविहार को धन दान दिए थे. वह अंतिम गुप्त सम्राट था जिसने हिमालय से लेकर नर्मदा नदी तक तथा मालवा से लेकर बंगाल तक के विस्तृत भू-भाग पर शासन किया.

 

नरसिंहगुप्त बालादित्य

यह बुधगुप्त का छोटा भाई था जो उसकी म्रत्यु के बाद शासक बना. ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय गुप्त साम्राज्य 3 राज्यों में बंट गया था. मगध वाले क्षेत्र में नरसिंहगुप्त राज्य करता था, मालवा क्षेत्र में भानुगुप्त जबकि बंगाल के भाग में वैन्यगुप्त ने अपना स्वतंत्र शासन स्थापित कर लिया था.

नरसिंहगुप्त बौद्धमतानुयायी था, उसने बौद्ध विद्यान बसुबन्धु की शिष्यता ग्रहण की थी. उसने अपने राज्य को स्तूपों तथा विहारों से सुसज्जित करवाया था.

नालंदा मुद्रालेख में नरसिंहगुप्त को परमभागवत कहा गया है. लगता है बौद्ध धर्म अंगीकार कर लेने पर भी उसने अपने पूर्वजों के समान परमभागवत की उपाधि ग्रहण की थी.

 

भानुगुप्त

भानुगुप्त का एरण से एक प्रस्तर स्तंभ- लेख प्राप्त हुआ है. इसमें उसे विश्व में सर्वश्रेष्ठ वीर तथा महान राजा कहा गया है. यह लेख उसके मित्र गोपराज का भी उल्लेख करता था. वह हूणों के विरुद्ध भानुगुप्त की ओर लड़ता हुआ मार डाला गया तथा उसकी पत्नी अग्नि में जलकर सती हो गयी. यह सतीप्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है, लेकिन यह लेख युद्ध के परिणाम का उल्लेख नही करता.

बुधगुप्त के बाद पूर्वी मालवा में जो हूणसत्ता स्थापित हुई, उसी का अंत करने के लिए भानुगुप्त ने यह युद्ध किया और इसमें उसे सफलता प्राप्त हुई. इतिहासकार हेमचंद राय चौधरी ने इस युद्ध को स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी गयी है.

 

कुमारगुप्त तृतीय

नरसिंहगुप्त के बाद उअका पुत्र कुमारगुप्त तृतीय मगध का राजा बना. दामोदरपुर के 5 वें ताम्रपत्र में किसी शक्तिशाली गुप्त राजा का उल्लेख मिलता है जिसकी उपाधियाँ परमदैवत महाराजाधिराज मिलती है.

 

विष्णुगुप्त

कुमारगुप्त तृतीय गुप्तवंशीय का अंतिम महान शासक था. नालंदा से प्राप्त एक मुद्रालेख से विष्णुगुप्त का लेख मिलता है जो संभवत उसका पुत्र था और 550 ई. तक राज्य करता रहा. इसके बाद गुप्त- साम्राज्य पूर्णतया समाप्त हो गया.

 

गुप्त प्रशासन

गुप्तों की प्रशासनीय व्यवस्था को प्राक- सामंती व्यवस्था कहा जा सकता है दूसरी विशेषता यह थी कि संपूर्ण साम्राज्य में एक जैसी व्यवस्था नही थी. गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत विभिन्न अधीनस्थ शासक राज्य, आश्रित राज्य इत्यादि थे जिन्हें प्रशासनिक स्वायत्ता प्राप्त थी. गुप्तों के अधीन गणराज्यों का पूर्ण विलयन हो गया और सर्वत्र राजतंत्रात्मक व्यवस्था स्थापित हो गयी.

 

केंदीय शासन

प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी राजा होता था. राज्य की समग्र प्रशासनिक शक्तियां उसी में केन्द्रित थी. वह कार्यपालिका, न्यायपालिका व सैनिक मामलों का प्रधान था, लेकिन उसे क़ानून बनाने का अधिकार नही था.

गुप्त शासकों ने गौरवपूर्व उपाधियों  द्वारा जनता पर अपना प्रभाव स्थापित किया. इन उपाधियों में विदित होता है कि गुप्त शासकों के अधीन अनेक छोटे राजा थे तथा गुप्त राजा देवता के सद्रश थे.

गुप्त राजाओं की तुलना सूर्य, अग्नि, यम, कुबेर, विष्णु से की गयी है. राजा युवराज, मंत्रीपरिषद् व नौकरशाही की सहायता से शासन करता था. कालिदास ने मंत्रीपरिषद् का उल्लेख किया है. मंत्री सामन्यता उच्च वंश से नियुक्त किये जाते थे. इनका पद बहुधा वंशगत होता था. इनका मुख्य कार्य विभिन्न विभागों की देखभाल करना व राजा को मंत्रणा देना था.

नौकरशाही को अमात्य के नाम से भी जाना जाता है. अमात्य का पद अधिकतर ब्राह्मणों के लिए सुरक्षित रहता था, परंतु अन्य वर्णों के लोगों की भी इस पद पर नियुक्ति होती थी. राजा सामान्यत खेती की उपज का 1/6 भाग कर के रूप में लेता था. जुर्माना, उपहार, शुल्क आदि से भी राज्य को आय होती थी.

 

विज्ञान व तकनीक

आर्यभटको गुप्तयुग का सबसे महान वैज्ञानिक गणितज्ञ व ज्योतिष माना जाता है उन्होंने अपने ग्रंथ आर्यभटीय में यह प्रमाणित कर दिया किप्रथ्वी गोल है, अपनी धुरी पर घुमती है तथा इसी कारण ग्रहण लगता है.

वराहमिहिर ने ज्योतिष के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किये और इनमें ज्योतिष विज्ञान की महत्वपूर्ण बातें लिखी गयी.

फलित ज्योतिष पर कल्याणवर्मन ने सारावली लिखी. नागार्जुन रसायन व धातुविज्ञान के विख्यात ज्ञाता थे. उन्होंने रस चिकित्सा का आविष्कार किया तथा बताया कि सोना, चांदी खनिज पदार्थों के रासायनिक प्रयोग से रोगों की चिकित्सा हो सकती है.

पारा का आविष्कार भी इसी समय हुआ. आयुर्वेद के सबसे प्रसिद्ध विद्वान धन्वन्तरी थे, जो चंद्रगुप्त दितीय के दरबारी थे.

 

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2 Comments

  1. Sanjay April 16, 2018
  2. gaurav ashok meshram April 22, 2018

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