Best Essay on Environment Pollution in Hindi पर्यावरण प्रदुषण निबंध

Best Essay on Environment Pollution in Hindi पर्यावरण प्रदुषण निबंध

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मानव जो इस सृष्टि की सबसे अद्भुत रचना और बुद्धिजीवी प्राणी है जो बहुत अच्छी तरह से जानता है कि इस धरती पर समस्त जीवन इस प्रकृति की ही देन है, अगर वह इसके नियमों के साथ छेड़छाड़ करता है या कोई बाधा उत्पन्न करता है तो उसका खामियाजा उसको यक़ीनन ही भुगतना पड़ेगा.

इस धरती पर रहने वाले मनुष्य को अपनी हर एक सांस के साथ प्रकृति के पर्यावरण का एहसास होना चाहिए और उसको शुक्रिया करना चाहिए इस दुर्लभ वातावरण का जिसको हमारे जीवन लिए तैयार किया गया है.

इस धरती के करोड़ों वर्षों के जीवन के इतिहास और इसकी उत्पत्ति के बारे में कोई भी अभी तक सही तरीके से अंदाज़ा नही लगा पाया है…..तो क्या हमें लगता है कि अगर इस धरती से इंसान ख़त्म हो गये तो ये धरती रहेगी….??

जी हाँ….!! बिल्कुल रहेगी, क्योंकि इस धरती पर रहकर हम इस पर कोई एहसान नही कर रहे, ये आपके बिना भी ऐसे ही चलती रहेगी जैसे अब चल रही है.

इस प्रकृति के साथ मजाक करना मानव जाति के लिए ही नही बल्कि समस्त सजीव प्रजाति के लिए ही खतरनाक है…और हम इंसानों को कोई हक़ नही बनता कि अपने निजी स्वार्थ के लिए दूसरों की जिन्दगी दांव पर लगाएं.

तो चलिए अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए शुरू करते हैं Best Essay on Environment Pollution in Hindi पर्यावरण प्रदुषण निबंध.

 

Pollution (प्रदुषण)

पर्यावरण में कुछ ऐसे अवांछित तत्वों का मिलना जो उसके सभी घटकों को किसी ना किसी रूप में हानि पहुंचाते हुए उसकी गुणवत्ता को कम करते हैं, प्रदुषण कहलाता है.

पर्यावरण के विभिन्न घटक जैसे जल, वायु, मिट्टी आदि सभी इससे प्रभावित होते हैं और इन सभी की छवि को नुकसान पहुँचता है. प्रकृति के अनुसार इन सभी तत्वों में इनकी अपनी ख़ास विशेषता होती है जिसके कारण ये सभी इस धरती के जीवन का सुव्यवस्थित ढंग से पालन करते हैं.

जब कभी भी कोई ऐसी चीज़ जो इनके लिए हानिकारक हो और इनमें मिलकर इनके गुणों को कम कर दे तो इससे पर्यावरण का नुकसान होता है और ये सभी तत्व गंदे होने लगते हैं, जिसको पर्यावरण प्रदुषण कहा जाता है.

कारखानों से निकलने वाला कचरा और धुँआ, लगातार बढती हुई जनसँख्या, शहरों में हुई वाहनों की वृद्धि, कार्बनडाई आक्साइड की मात्रा में वृद्धि, पेड़ों की कटाई, शहरीकरण, खेतों में उपयोग हुए उर्वरक…..आदि सभी पर्यावरण को प्रदूषित करने में अपनी अहम् भूमिका निभाते हैं.

पृथ्वी की ओजोन परत जो इस धरती को सूर्य की हानिकारक पराबेंगनी किरणों से बचाती है और पृथ्वी के वातावरण को जीवन की सुरक्षा के लिए संतुलित रखती है…आज उसकी शक्ति धीरे धीरे करके बहुत ही कम होती जा रही है और इसका सबसे बड़ा कारण है वातावरण में क्लोरो- फ्लोरो कार्बन की बढती हुई मात्रा.

ओजोन की क्षति से मानव को बढ़ते हुए तापमान और बर्फ पिघलने से होने वाली बाढ़ आदि जैसे संकटों से जूझना पड़ रहा है.

कारखानों और फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुंए के साथ जो गैस होती हैं वो वायु को प्रभावित करती हैं और मीलों से निकलने वाला कचरा भी जिसको नदियों के पानी के साथ बहा दिया जाता है, जल प्रदुषण जैसी समस्याओं को जन्म देता है.

प्रदुषण पर चर्चा

 

प्रदुषण के प्रकार (Types of Environment Pollution)

1). वायु प्रदुषण
2). जल प्रदुषण
3). भूमि प्रदुषण
4). ध्वनि प्रदुषण
5). प्रकाश प्रदुषण
6). रेडियोधर्मी प्रदुषण

 

वायु प्रदुषण (Air Pollution)

 

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जब पर्यावरण की वायु में कोई रसायन या फिर ऐसे सूक्ष्म पदार्थ मिल जाते हैं जो वायु की गुणवत्ता को ख़राब करते हैं और साथ ही साथ मानव व जीव जंतुओं के लिए हानिकारक साबित होते हैं, उसे वायु प्रदुषण कहा जाता है.

धरती पर जीवन का सबसे महत्वपूर्ण घटक है ओक्सीजन….और जब वायु में ओक्सीजन की दूषित हो जायेगी और मानव जाति और जीवों को सांस की परेशानियाँ पैदा होना शुरू हो जायेंगी.

शहरी इलाकों में जहाँ फैक्ट्री और कारखाने सबसे अधिक मात्रा में पाए जाते हैं वहां की वायु बहुत ज्यादा दूषित हो जाती है और वहां के तापमान में भी वृद्धि होने लगती है.

पेड़ों की कटाई इसका सबसे अहम् कड़ी है क्योंकि पेड़- पौधे ही हैं जो ओक्सीजन की मात्रा को वातावरण में पर्याप्त बनाये रखते हैं और अगर इतनी बड़ी जनसंख्या में हम इन पेड़- पौधों को ही धीरे धीरे नष्ट करते रहें तो हमारे पास विनाश देखने के अलावा और कोई विकल्प नही रह जाएगा.

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वायु प्रदुषण के कारक

1). शहरी इलाकों में भारी संख्या में चलने वाले वाहन जिनसे भारी मात्रा में लगातार कार्बन सहित धुंआ निकलता रहता है, वायु को लगातार प्रदूषित करता रहता है.

2). बढती हुई मानवों की जनसंख्या इस धरती के लिए दिन- प्रतिदिन बोझ बनती जा रही है जिससे लोगों के घरों और सडकों के निर्माण के लिए पेड़ों और वनों की कटाई एक गंभीर मुद्दा बनकर उभरा है, जो कि पर्यावरण के बढ़ते हुए तापमान का अहम् कारण है.

3). कोयला, लकड़ी, प्राकृतिक गैस आदि जैसे ईधन जब गलत तरीके से खुले में जलाएं जाते हैं तो उससे निकलने वाले धुंए में कार्बनडाई ऑक्साइड की मात्रा अधिक निकलती है जिससे वायुमंडल के तापमान में वृद्धि होने के साथ साथ ओक्सीजन की मात्रा भी प्रभावित होती है.

4). विश्व युद्ध और परमाणु परिक्षण में परमाणु शक्ति का प्रयोग सबसे ज्यादा और बहुत तेज़ी से वायु को दूषित करता है क्योंकि इससे रेडियोधर्मी पदार्थों का भी बहुत अधिक मात्रा में उत्सर्जन होता है.

5). घरों और ऑफिस में एसी बहुत अधिक उपयोग किया जाने लगा है जिससे क्लोरोफ्लोरो कार्बन का उत्सर्जन होता है जिससे पृथ्वी की ओजोन परत को बहुत हानि होती है. लगातार ओजोन परत के कमजोर होने से यह सूर्य की हानिकारक पराबैगनी किरणों को रोकने में सक्षम नही हो पाती और पृथ्वी की सतह का तापमान लगातार बढ़ने से विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ जन्म लेती हैं.

 

जल प्रदुषण (Water Pollution)

 

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जल प्रदुषण एक ऐसी समस्या इस समय बन चुकी है जिसके प्रभाव में काफी बड़े बड़े देश अब आ चुके हैं. अब पीने योग्य पानी बहुत ही कम मात्रा में बचा है और बाजारों में इसको बोतलों में बेचा जा रहा है.

जब मानव की विभिन्न क्रियाओं से जिससे जल में अपशिष्ट पदार्थ मिल जाते हैं या औद्योगिक क्षेत्रों से रसायन युक्त पानी नदियों और तालाब के पानी में मिला दिया जाता है जिससे पानी की गुणवत्ता में कमी आती है और वो पीने योग्य नही रह जाता, जल प्रदुषण कहलाता है.

जल प्रदुषण इस समय भयंकर बीमारियों का जन्मदाता बन चुका है, जिनमें भारत और चीन दो ऐसे बड़े देश में जिनके ज्यादातर बड़े शहरों का पानी दूषित हो चुका है और जल प्रदुषण की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं.

जल प्रदुषण के भी अनेक तरीकों से होता है जो हमें पता होना चाहिए जैसे कि प्लास्टिक, खेतों में उपयोग किये उर्वरक, कारखानों का मलबा, पेट्रोलियम और रासायनिक गैसें आदि जब स्वच्छ जल में मिलती हैं तो यकीनन ही उसकी गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं.

Pollution Cause and Effects

 

जल प्रदुषण के कारक

1). कारखानों और मीलों से निकलने वाले कचरे में बहुत से तरह के रसायन और धातुएं होती हैं जिनको सीधा शहर के किसी नहर, तालाब या नदी में बहा दिया जाता है, जो जल को बहुत ज्यादा ही हानि पहुंचता है.

2). शहरों में प्लास्टिक बैग और पोलीथिन का बहुत ज्यादा उपयोग होता है और जब ये सब कचरे के रूप में नालों से होते हुए साफ़ पानी के सम्पर्क में आते हैं तो उसको दूषित करने के अलावा और कुछ नही करते.

3). बहुत सी रिफाइनरी तेल की कंपनियां ऐसी हैं जिनसे काफी मात्रा में तेल रिसाव होने के कारण नदी, तालाब तक पहुँचता है जो कि पूरे पानी में फ़ैल जाता है और यही कारण है कि ऐसी फैक्ट्रीयों के आस-पास की नदियों में मछलियाँ बहुत ही कम पायी जाती हैं.

4). खेती के लिए आजकल काफी किस्म के कीटनाशक दवाइयां बाज़ार में मिलती हैं और उनके छिडकाव से यक़ीनन ही पानी की गुणवत्ता को बहुत ही हानि होती है जो कि रिसाव से होते हुए जमीन के अंदर तक चला जाता है.

5). परमाणु प्रयोगशालाएं जिनसे काफी मात्रा में रेडियोधर्मी पदार्थ निकलते हैं और पानी के संपर्क में आते ही ये बहुत ज्यादा मात्रा में जल प्रदूषित करते हैं.

 

भूमि प्रदुषण (Soil Pollution)

 

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सभी जानते हैं कि मानव और जीव-जंतु दोनों ही इस धरती पर अपनी भूख के लिए इस धरती से उगे हुए अनाज, फल तथा सब्जियां इस्तेमाल करते हैं और अगर इस मिट्टी की गुणवत्ता में ही कमी आने लगेगी तो यक़ीनन हमारे जीवन पर काफी प्रभाव पड़ने वाला है.

उपजाऊ मिट्टी में कुछ ऐसे रसायन और अप्राकृतिक तत्वों का मिल जाना जो उस मृदा के उपजाऊपन के लिए हानिकारक होते हैं और मिट्टी की गुणवत्ता कम हो जाती है, मृदा प्रदुषण कहलाता है.

मृदा प्रदुषण प्राकृतिक भी हो सकता है, लेकिन ये ज्यादातर मानव द्वारा की गयी औद्योगिक क्रियाओं से ही होता है. जब कारखानों से निकले गये खतरनाक रसायन उपजाऊ मिटटी से मिलते हैं तो यक़ीनन मिट्टी का उपजाऊपन नष्ट होता है और इसकी फसल उगाने की क्षमता भी बहुत कम हो जाती है.

इसके दुष्प्रभाव भी सबसे ज्यादा देखने को मिलते हैं क्योंकि रसायन मिली मिट्टी के अनाज से लोगों में विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ जन्म लेती हैं जिसका अंदाज़ा भी हमें बाद में चलता है.

किसान लोग भी अच्छी और ज्यादा फसल के लिए अलग अलग तरीके के खाद और कीटनाशक उपयोग करते हैं जिससे मृदा पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है. जिन खेतों के आस-पास बड़े बड़े कारखाने होते हैं वो जमीनें ज्यादातर बंजर ही हो जाती हैं क्योंकि उसके रसायन का प्रभाव पानी के सहारे होते हुए सीधे मिट्टी तक पहुँच ही जाता है.

 

मृदा प्रदुषण के कारक

1). खेती में उपयोग में लाये जाने वाले कीटनाशक पदार्थों और केमिकल फ़र्टिलाइज़र का प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है, जिससे निकलने वाली नाइट्रोजन और फास्फेट दोनों ही भूमि की उर्वरकता का हास करते हैं, और कुछ ही सालों में भूमि के बंज़र होने की संभावना भी काफी बढ़ जाती है.

2). बहुत सी जगह पर ऐसा देखने में आया कि गेंहू और चावल की फसल के लिए 2011 में सरकार ने उत्तराखंड की फसलों को खाने से रोक लगा दी थी क्योंकि वहां लोगों ने जहाँ 4 बैग यूरिया के लगते हैं वहां 10 बैग लगाना शुरू कर दिया था अधिक फसल के उत्पादन के लिए….जिसने पूरी फसल को जहरीला कर दिया.

3). प्लास्स्टिक मृदा को सबसे ज्यादा हानि पहुंचाती है क्योंकि ये कभी भी गलती नही है. घरों और शहरों से कचरे के रूप में निकलने वाली प्लास्टिक जब खेतों की मिट्टी के संपर्क में आती है तो ये सालों साल तक ऐसे ही उसमें दबी रहती है, जो मृदा की भौतिक संरचना को सीधे सीधे प्रभावित करती है.

4). कार्बनिक व अकार्बनिक रसायन, जहरीले और लौह अपशिष्ट, युरेनियम आदि ऐसे तत्व हैं जो मिटटी की उर्वरक शक्ति को बिलकुल ही नष्ट कर सकते हैं. विभिन्न कारखानों से निकलने वाले कचरे को अगर बिना किसी सावधानी के फेंक दिया जाता है तो ये भूमिगत जल के साथ साथ मृदा की शक्ति को भी ह्रास करते हैं.

 

ध्वनि प्रदुषण (Noise Pollution)

 

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ध्वनि सामान्यतः किसी भी वस्तु के कम्पन्न होने से ही उत्पन्न होती है जिसका आभास हमें हमारे कानों से होता है. कभी कभी ऐसी ध्वनि सुनाई देती है जो किसी अवांछित तीवृता के साथ होती है जिसे शोर भी कहा जा सकता है, और इसको ही ध्वनिप्रदुशन कहा जाता है जो एक अद्रश्य प्रदुषण है.

ज्यादातर शहरी और भीड़- भाड़ वाले इलाकों में यातायात और बढती जनसंख्या से यह शोरगुल होता है और हमें पता भी चलता कि शायद ये शोर भी प्रदुषण का ही हिस्सा है, जिसका असर मानव, जीव-जंतु और यहाँ तक कि पेड़-पौधों पर भी होता है.

शोर एक ऐसी ध्वनि है जो मानव के कानों को खराब लगती है और उसकी कार्य क्षमता को प्रभावित करती है. ध्वनि की तीव्रता को डेसीबल इकाई में नापा जाता है. ज्यादा तीव्र ध्वनि इतनी ज्यादा खतरनाक होती है कि ये जानवर और मानव के कानों को बिल्कुल ही खराब भी करने में सक्षम है.

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ध्वनि प्रदुषण के कारक

1). ध्वनि प्रदुषण के कुछ स्रोत प्राकृतिक भी हैं जैस बिजली की कडकड़ाहट, बादलों का गरजना, ज्वालामुखी का फटना आदि….लेकिन अगर देखा जाए तो सब क्रियाएँ बहुत ही कम होती हैं इसलिए इनसे ज्यादा प्रदुषण का खतरा नही होता.

2). शहरी इलाकों में सडकों पर रोज लाखों वाहन चलते हैं और साथ साथ रेल, हवाई जहाज, जेट विमान आदि की ध्वनि सबसे ज्यादा noise pollution करती है.

3). औद्योगिक क्षेत्रों में भी ध्वनि प्रदुषण काफी बड़ी मात्रा में होता है जहाँ फैक्ट्री और मीलों की बड़ी बड़ी मशीने जोरों से आवाज़ करती हैं और बायलर, टरबाइन, ड्रायर आदि की आवाज़ तो इतनी ज्यादा होती है कि पास खड़े लोगों को आस-पास की ध्वनि भी सुनाई नही देती.

4). शादी, सगाई, त्योहार आदि उत्सवों पर डीजे का बजना भी ध्वनि प्रदुषण का ही अहम् हिस्सा है जो लोगों के साथ साथ जानवरों और वनस्पतियों को भी अप्रत्यक्ष रूप से हानि पहुंचता है.

 

पर्यावरण प्रदुषण कम करने/ रोकने के उपाय

1). मानव जनसँख्या वृद्धि पर नियंत्रण

2). फैक्ट्री और कारखानों की धुएं की चिमनियों को काफी उंचाई पर लगाना

3). ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाना

4). वाहनों को कम धुएं वाला डिज़ाइन करना और पुराने वाहनों पर रोक लगाना

5). कारखनों के पानी को सीधे नदी में छोड़ने से पहले उसको प्रोसेस करके उसमें से हानिकारक रसायन को ख़त्म करना

6). प्लास्टिक जैसे पदार्थों के उपयोग पर रोक लगाना

7). कम शोर करने वाली मशीनों को ही कारखानों में लगवाना

8). वाहनों के हॉर्न को अधिक तीव्रता से बजने पर रोक

9). रासायनिक काद की अपेक्षा जैविक खाद के उपयोग पर बल

10). मृदा अपरदन कम करने के लिए खेतों और सडकों के किनारे पौधे लगाना.

 

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