Oops! It appears that you have disabled your Javascript. In order for you to see this page as it is meant to appear, we ask that you please re-enable your Javascript!

मौर्य साम्राज्य और इतिहास: चंद्रगुप्त मौर्य/ Chandragupta Maurya Samrajy History in Hindi

Chandragupta Maurya Samrajy History in Hindi

मौर्य साम्राज्य और इतिहास: चंद्रगुप्त मौर्य/ Chandragupta Maurya Samrajy History in Hindi

मगध- साम्राज्यवाद के उदय ने अंतत: मौर्य साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया. मौर्यों ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर राजनीतिक एकता स्थापित की थी. इस वंश के प्रमुख शासकों में चंद्रगुप्त, बिंदुसार व अशोक के नाम उल्लेखनीय हैं.

 

मौर्य वंश के शासक

1). चंदगुप्त मौर्य (322- 298 ई.पू.)

चंद्रगुप्त मौर्य, चाणक्य की सहायता से अंतिम नन्दवंशीय शासक घनानंद को पराजित कर 25 वर्ष की अल्पायु में मगध के सिंहासन पर आसीन हुआ. चंद्रगुप्त का नाम प्राचीनतम अभिलेखीय साक्ष्य रूद्रदामन का जुनागढ़ अभिलेख में मिलता है.

चंद्रगुप्त मौर्य ने व्यापक विजय प्राप्त करके प्रथम अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की थी. चंद्रगुप्त ने तत्कालीन यूनानी शासक सेल्यूकस को भी पराजित किया और धीरे धीरे करके चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य संपूर्ण भारत में फ़ैल गया.

मगध साम्राज्य के उत्कर्ष की जो परम्परा हर्यकवंशीय बिम्बिसार के समय में आरम्भ हुई थी, चंद्रगुप्त के समय में वह अपने चरम सीमा पर थी.

चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य का विस्तार उत्तर- पश्चिम में हिंद्कुश से लेकर दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक तक तथा पूर्व में मगध से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र तक था.

चंद्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का समर्थक था. जैन अनुयायियों के अनुसार जीवन के अंतिम चरण में चंद्रगुप्त ने राजकाज अपने पूत्र बिंदुसार को सौंप दिया था तथा जैन आचार्य भद्रभाहू से शिष्वत्व ग्रहण कर उसके साथ श्रवणबेलागोला (मैसूर) चला गया तथा चंद्रगिरी पहाड़ी पर काया- क्लेश द्वारा 297 ई. पू. में अपने प्राण त्याग दिए थे.

 

Chandragupta Maurya Samrajy History in Hindi

 

सेल्यूकस से युद्ध (305- 304 ई.पू.)

सिकंदर की म्रत्यु के पश्चात सेल्यूकस बेबीलोन का राजा बना. बैक्ट्रिया विजय के बाद उसके मन में सिकंदर के भारत विजय के अधूरे काम को पूरा करने की लालसा जाग उठी.

जिसके चलते वह काबुल के मार्ग से होते हुए सिन्धु नदी की ओर बढ़ा. उसने सिन्धु नदी पार की और चंद्रगुप्त की सेना से उसका सामना हुआ, परंतु वह चंदगुप्त द्वारा पराजित हुआ. 303 ई.पू. चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस के बीच संधि हुई.

इस संधि के चलते सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चंद्रगुप्त मौर्य के साथ कर दिया, जो कि प्रथम अन्तगराष्ट्रीय विवाह था.

प्लूटार्क के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य ने भी सेल्यूकस को 500 हाथी उपहार में दिए और सेल्यूकस ने चंद्रगुप्त को दहेज़ में 4 राज्य प्रदान किये.

 

2). बिंदुसार (298- 273 ई.पू.)

बिंदुसार, चंद्रगुप्त का पुत्र था जिसके पैदा होने से ही उसके मस्तक पर बिंदु था इसलिए नाम बिंदुसार पड़ा. यूनानियों ने इसे अमित्रघात कहा है, जिसका अर्थ शत्रुओं का नाश करने वाला है.

बिंदुसार ने सुदूरवर्ती दक्षिण भारतीय क्षेत्रों को भी जीत कर मगध साम्राज्य में शामिल कर लिया था. बिंदुसार की मंत्रिपरिषद सबसे बड़ी थी जिसमें 500 सदस्य थे. बुन्दुसार की म्रत्यु 273 ई.पू. लगभग हुई थी.

मौर्य साम्राज्य और इतिहास: चंद्रगुप्त मौर्य/ Chandragupta Maurya Samrajy History in Hindi

 

3). अशोक (273- 232 ई.पू.)

अशोक, बिंदुसार का पुत्र था. असंधिमित्रा अशोक की पत्नी थी जिसके कोई भी संतान नही थी, लेकिन अशोक को दूसरी पत्नी पदमावती से एक पुत्र उत्पन्न हुआ था.

बौध ग्रंथ के अनुसार बौद्ध होने के पूर्व उसे चंड अशोक कहा जाता था. शासनादेशों को शिलाओं पर खुदवाने वाला प्रथम भारतीय शासक अशोक ही था. अशोक का नाम मात्र लघु शिलालेख प्रथम की प्रतिकृतियों में ही मिला है.

अशोक ने 273 ई.पू. ही सिंहासन प्राप्त कर लिया था, लेकिन 4 वर्ष तक गृहयुद्ध में रहने के कारण अशोक का वास्तविक राज्यभिषेक 269 ई.पू. में हुआ. कल्हण की राजतरंगिनी की अनुसार अशोक ने कश्मीर में श्रीमगर की स्थापना की थी.

अपने राज्याभिषेक के 8 वें वर्ष में अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया और उसे जीत लिया. कलिंग युद्ध में हुए व्यापक नरसंहार ने अशोक को विचलित कर दिया जिसके चलते उसने शस्त्र त्याग की घोषणा कर दी. इसके बाद उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया जबकि इससे पहले वह ब्राह्मण मतानुयायी था.

अशोक प्रथम शासक था जिसने अभिलेखों के माध्यम से प्रजा को संबोधित किया. सर्वप्रथम 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने अशोक के अभिलेखों को ब्राह्मी लिपि में पढने में सफलता प्राप्त की थी जिसमें अशोक की पहचान प्रियदर्शी के रूप में हुई है.

 

कलिंग का युद्ध (261 ई.पू.)

 

Chandragupta Maurya Samrajy History in Hindi

 

राज्याभिषेक के 8 वर्ष बाद अशोक ने अपने पिता की दिग्विजय की नीति को जारी रखा. उस समय कलिंग का राज्य मगध साम्राज्य की प्रभुसत्ता को चुनौती दे रहा था. कलिंग को महापदमनंद ने जीत कर मगध साम्राज्य में मिला दिया था.

बिंदुसार के शासन काल में किसी समय कलिंग ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दिया था. कलिंग का प्राचीन राज्य दक्षिणी उड़ीसा में स्थित था. कलिंग युद्ध और उसके परिणामों के विषय में अशोक के 13 वें अभिलेखों से विस्तृत सुचना प्राप्त होती है.

13 वें शिलालेख में इस युद्ध के भयानक परिणामों का उल्लेख हुआ है, जिसमें 1 लाख 50 हजार व्यक्ति बंदी बनाकर निर्वासित कर दिए गये, 1 लाख लोगों की ह्त्या की गयी तथा इससे भी कई गुना अधिक मर गये. युद्ध में भाग ना लेने वाले ब्राह्मणों, श्रमणों तथा ग्राहस्तियों को अपने सम्बन्धियों के मारे जाने से कष्ट हुआ. सम्राट ने इस नरसंहार को खुद अपनी आँखों से देखा था.

कलिंग मगध साम्राज्य का एक प्रांत बना लिया गया तथा राजकुल का कोई राजकुमार वहां का उपराजा नियुक्त कर दिया गया.

इस प्रकार कलिंग युद्ध ने अशोक के ह्रदय में महान परिवर्तन उत्पन्न कर दिया. उसका ह्रदय मानवता के प्रति दया व करुणा से भर गया तथा उसने युद्ध-क्रियाओं को सदा के लिए बंद करने की प्रतिज्ञा की.

चंद्रगुप्त मौर्य का इतिहास

 

मौर्य प्रशासन

मौर्य प्रशासन की जानकारी मेगास्थनीज़ के इंडिका, कौटिल्य के अर्थशास्त्र व अशोक के अभिलेखों से मिलती है.

 

प्रशासनिक व्यवस्था

चंद्रगुप्त मौर्य के प्रशासन में प्रधान उद्देश्य इसे लोकहितकारी बनाना था. इस उद्देश्य से एक ओर तो विकास तथा आर्थिक हितों की सुरक्षा पर बल दिया गया तो दूसरी ओर शोषण व विघटनात्मक प्रवतियों पर अंकुश लगा कर जनता का जीवन खुशहाल बनाने के उद्देश्य से कठोर नियम बनाए गये.

मौर्य प्रशासनिक व्यवस्था राजा पर आधारित थी. अर्थशास्त्र में राजस्व- संबंधी महत्वपूर्ण पहलुओं का वृहद विवेचना हुआ है. इंडिका भी मौर्य शासक चंद्रगुप्त के व्यक्तित्व जीवन व कार्यकलापों का उल्लेख करता है.

कौटिल्य राजतंत्र का समर्थक था वह राजा को सर्वशक्तिशाली और राज्य का सबसे महत्वपूर्ण अंग मानता था. उसके अनुसार राजा समाज में फैली अव्यय्वस्था की स्थिति को समाप्त करने के लिए हुई थी.

परम्परागत राज्यशास्त्र के सिधांतों के अनुसार राजा सिर्फ धर्म का पालन करने वाला होता था, क़ानून का निर्माता नही, परन्तु कौटिल्य राजा को क़ानून निर्माण- संबंधी अधिकार भी देता है.

इस प्रकार राजा को विधायिका- संबंधी अधिकार भी मिला, जो सेना व न्याय का भी प्रधान था.

 

मौर्य- नौकरशाही

अर्थशास्त्र में एक विस्तृत नौकरशाही का भी उल्लेख किया गया है. राज्य के विभिन्न विभागों की देखभाल के लिए अनेक पदाधिकारियों को नियुक्त किया गया था. सबसे ऊँचे अधिकारीयों को तीर्थ या अमात्य कहा गया है जिनकी संख्या 18 थी.

मौर्य- नौकरशाही एक पिरामिड के सामान थी, जिसके सबसे शीर्ष पर मंत्री और उनके नीचे अन्य कर्मचारी थे.

 

सैन्य- संगठन

चंद्रगुप्त मौर्य ने एक विशाल व स्थायी सेना का भी गठन किया. प्रशासन की तरफ से सेना की देखभाल का उचित प्रबंध किया गया. कौटिल्य व मेगास्थनीज़, दोनों ही सैन्य- व्यवस्था का उल्लेख करते हैं.

कौटिल्य के अनुसार सेना चतुरंगिणी (पैदल, हाथी, घोडा और रथ) था. सीमांतों की रक्षा के लिए मजबूत दुर्ग बनाये गये थे, जिनकी सुरक्षा दुर्गपाल और अन्तपाल करते थे.

मौर्य साम्राज्य और इतिहास: चंद्रगुप्त मौर्य/ Chandragupta Maurya Samrajy History in Hindi

 

पुलिस व गुप्तचर

आंतरिक सुरक्षा व अपराध तथा अपराधियों पर नियंत्रण रखने के लिए राज्य ने पुलिस और गुप्तचरों की भी व्यवस्था की. नगर में शांति व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी नगराध्यक्ष की थी, जो पुलिस विभाग का प्रधान होता था. पूरे साम्राज्य में गुप्तचरों का जाल सा बिछा हुआ था.

राज्य की तरफ से अनेक न्यायलय स्थापित किये गये थे, जिनमे सबसे निचे ग्राम न्यायालय थे. छोटे झगड़ों को निचले स्तर पर ही निबटाने के लिए और अपराधियों को दंडित करने क व्यवस्था थी.

अर्थशास्त्र में विभिन्न स्रोतों का उल्लेख किया गया है, जिनसे राज्य को राजस्व की प्राप्ति होती थी. इसके अनुसार राज्य को दुर्ग, सेतु, वन और वणिक पथ से आय होती थी. दुर्ग से अनेक प्रकार के कर उगाहे जाते थे जैसे चुंगी, जुर्माना, जेलखाना, शराब, वस्त्र- उद्योगों, वेश्या, कारीगर, अचल संपति पर कर.

 

मौर्यकालीन समाज

कौटिल्य के अनुसार वर्णव्यवस्था ही समाजक संगठन का आधार है, इसलिए प्रत्येक वर्ण की स्थिति व उनके कर्तव्यों का विवरण अर्थशास्त्र में दिया गया है.

वर्णव्यवस्था भंग होने से पूरी सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जाती, जिसका प्रभाव राज्य के अस्तित्व पर भी पड़ता. इसलिए राजा को वर्णाश्रमधर्म की स्थापना की सलाह दी गयी. 4 वर्णों के व्यवसाय निर्धारित थे, जिनका पालन करना उनके लिए आवश्यक था.

ब्राह्मणों (शिक्षकों, पुरोहितों, वेद का पाठ करने वालों) को राज्य की ओर से करमुक्त भूमि दान में दी जाती थी.

मौर्य युग में ही नई बस्तियों में शूद्रों को प्रथम बार भूमि भी दी गयी थी. शूद्रों की स्थिति में परिवर्तन का प्रमाण इस बात से भी लगता है कि अर्थशास्त्र में शुद्र को आर्य कहा गया है.

 

स्त्रियों की दशा

मौर्य काल में पारिवारिक व सामाजिक जीवन सुख-शान्ति का था. संयुक्त परिवार की प्रथा ज्यादातर प्रचलित थी.

विवाह की संस्था पूर्णरूपेण स्थापित हो चुकी थी. अधिकाँश विवाह एकात्मक ही होते थे, लेकिन बहु-विवाह के भी यहाँ उदहारण मिलते हैं.

अर्थशास्त्र में सती-प्रथा का उल्लेख नही मिलता है, लेकिन यूनानी लेखक भारत के उत्तर- पश्चिम में योद्धाओं की पत्नियों के सती होने का उल्लेख करते हैं.

मौर्य युग में वेश्याओं का भी उल्लेख मिलता है. स्वतंत्र रूप से वेश्यावृति करने वाली स्त्रियाँ रूपजीवा कहलाती थीं और इनसे राज्य को राजस्व प्राप्त होता था और स्त्रियों से गुप्तचरी का काम भी लिया जाता था.

 

मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था

मौर्यों ने मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई, जिसके अंतर्गत कृषि, व्यवसाय व व्यापार- वाणिज्य की प्रगति हुई और जिसके कारण मौर्य युग की आर्थिक सम्पन्नता बड़ी.

चंद्रगुप्त मौर्य का इतिहास

 

कृषि पद्धति

मौर्यकाल में सभी प्रकार की फसलों का उत्पादन होता था. अर्थशास्त्र में धान की फसल को सर्वोत्तम माना जबकि गन्ने की फसल को बेकार बताया.

चरगाह के साथ साथ वन भी थे, जिन पर राज्य का अधिकार था. पशुवन में जंगली जानवर रहते थे और मृगवन पालतू पशुओं के लिए था. हस्तिवन में हाथी पाए जाते थे जो युद्ध में काम आते थे.

 

मुद्रा प्रणाली

मौर्यकाल तक मुद्रा का भी प्रचलन हो चुका था. मुद्रा के निर्माण व संचालन पर राज्य का एकाधिकार था.

अर्थशास्त्र से भी विस्तृत मुद्रा प्रणाली की चर्चा की गयी है. विभिन्न प्रकार के सिक्कों पण, सुवर्ण, कार्षापण, माषक, काकणी का उल्लेख मिलता है.

 

बौद्ध धर्म

बौद्धधर्म की मौर्य काल में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. अशोक जैसे महान सम्राट के प्रयासों से धम्म के साथ साथ बौद्धधर्म का भी व्यापक रूप से प्रसार हुआ. उसके प्रयासों से यह धर्म श्रीलंका और मध्य एशिया तक फ़ैल गया.

बौद्धसंघ में व्यापक मतभेदों को दूर करने के लिए उसने बौद्धों की तीसरी संगीति पाटलिपुत्र में बुलाई थी.

 

शिक्षा और साहित्य

मौर्यकाल में भाषा, लिपि व साहित्य का भी विकास हुआ. संस्कृत, पालि व प्राकृत भाषाओँ का विकास भी इस समय हुआ.

ब्राह्मण, जैन व बौद्धधर्मों के विकास ने धार्मिक साहित्य की रचना को प्रभावित किया. वेदांगों व धर्मसूत्रों की रचना इसी काल में हुई.

 

Also Read:

स्वर्णिम भारत का इतिहास History of India in Hindi

हडप्पा सभ्यता सिंधु घाटी सभ्यता

वैदिक सभ्यता: संस्कृति साहित्य और इतिहास

मुग़ल काल और साम्राज्य/ Mughal empire Period in Hindi

1857 की क्रांति विद्रोह/ 1857 Kranti Vidroh in Hindi

 

उम्मीद करता हूँ कि आपको “मौर्य साम्राज्य और इतिहास: चंद्रगुप्त मौर्य/ Chandragupta Maurya Samrajy History in Hindi” आर्टिकल पसंद आया होगा.

Thanks a lot to be BusinessBharat Blog reader….
Hope you Enjoy & Learn !!

5 Comments

  1. gaurav ashok meshram April 23, 2018
  2. Dr. Zakir Ali Rajnish April 26, 2018
  3. Akash Kumar May 1, 2018
  4. HindiApna July 11, 2018
  5. Ved prakash July 15, 2018

Leave a Reply