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भारत का भूगोल Geography of India in Hindi

भारत का भूगोल Geography of India in Hindi

भारत का भूगोल Geography of India in Hindi

मनुष्य अपने पर्यावरण में परिवर्तन करने में सक्षम है और वो प्राकृतिक संसाघनों को अपनी इच्छानुसार उपयोग कर सकता है. भूगोल के नामकरण और इस विषय को व्यवस्थित रूप प्रदान करने का श्रेय यूनान के निवासियों को जाता है. हिकेटियस को भूगोल का जनक माना जाता है.

“भूगोल एक ऐसा स्वतंत्र विषय है जिसका उद्देश्य लोगों तक संपूर्ण विश्व, स्थल, महासागर, जीव-जंतुओं, आकाशीय पिंडों, वनस्पति, फलों व धरालत आदि सभी क्षेत्रों की प्रत्येक वस्तु का ज्ञान प्रदान करना है”.

‘भूगोल वह विज्ञान है, जिसमें प्रथ्वी को स्वतंत्र ग्रह के रूप में मान्यता देते हुए उसके समस्त लक्षणों, घटनाओं आदि का अध्ययन किया जाता है.

‘भूगोल में प्रथ्वी के उस भाग का अघ्ययन किया जाता है जो मानव के रहने योग्य स्थान है’.

 

भारत का नामकरण (Nomenclature of India)

वायुपुराण में भारत वर्ष शब्द का उल्लेख मिलता है जो सम्राट द्वारा विजित क्षेत्र को कहा जाता था. राजा दुष्यंत के पुत्र भरत के नाम पर देश का नामकरण हुआ. पर्शिया (आधुनिक ईरान) के लोगों ने सबसे पहले सिन्धु घाटी से प्रवेश किया.

ये लोग सिंघु का बदला रूप हिंदू यहाँ के निवासियों के लिए प्रयोग करते थे. हिन्दुओं के देश को हिन्दुस्तान नाम दिया गया. आर्य जब भारत आये तो वे बहुत सारे कबीलों के रूप में देश के विभिन्न क्षेत्रों में फ़ैल गये जिसे आर्यावर्त (आर्यों का देश) के नाम से जाना गया.

जैन पौराणिक कथाओं के अनुसार हिंदू और बौद्ध ग्रंथों में भारत हेतु जम्बुद्वीप शब्द का प्रयोग किया गया है. भारत के लिए प्रयुक्त इंडिया शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के इंडोस से हुआ है. फ़्रांसिसी प्रभाव के कारण अंग्रेज ने इंदे को आधार मानकर इंडिया नामकरण किया.

जेम्स अलेक्जेंडर ने अपने विवरण में हिंदू का ह शब्द हटाकर देश को इंदु नाम से संबोधित किया था, फिर बाद में बदलकर इंडिया हो गया.

 

भारत की स्थिति व विस्तार (India’s Location & Extension)

भारत चतुष्कोण आकृति वाला देश है. यह दक्षिण एशिया के मध्य में स्थित है. इसके पूर्व में इंडो-चीन प्रायदीप एवं पश्चिम में अरब प्रायदीप स्थित है. भारत अक्षांशीय द्रष्टि से उत्तरी गोलार्द्ध का देश है तथा देशंतरीय द्रष्टि से पूर्वी गोलार्द्ध के मध्यवर्ती स्थिति में है.

भारत का अक्षांशीय व देशांतर विस्तार में लगभग 30 डिग्री अंतर है. उत्तर- दक्षिण दिशा में इसकी लम्बाई 3214 किमी. है. भारत का देशांतरीय विस्तार कच्छ के रण से अरुणाचल प्रदेश तक पूर्व- पश्चिम दिशा में इसकी चौड़ाई 2933 किमी. है.

विषुवत व्रत के निकट स्थित भारतीय क्षेत्रों में दिन और रात की अवधि में अधिकतम 45 मिनट का अंतर है, जबकि उत्तरतम सीमा पर यह अंतर 5 घंटे का हो जाता है.

प्रथ्वी 24 घंटे में अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व दिशा में 360 डिग्री देशांतर घूम जाती है. इस प्रकार 1 डिग्री देशांतर पार करने के लिए 4 मिनट का समय लगता है.

समय के अंतर की इस कमी को दूर करने के लिए अन्य देशों की तरह भारत ने भी एक मानक मध्यान्ह रेखा का चयन किया है. मानक मध्यान्ह रेखा पर जो स्थानीय समय होता है, उस समय को देश का मानक समय माना जाता है.

विश्व के देशों में आपसी समझ के अंतर्गत मानक याम्योत्तर को 7 डिग्री 30 मिनट देशांतर के गुणांक पर चुना जाता है. यही कारण है कि 82 डिग्री 30 मिनट पूर्वी देशांतर रेखा को भारत की मानक याम्योत्तर चुना गया है.

भारत का मानक समय इलाहबाद के निकट मिर्जापुर से गुजरने वाली 82 डिग्री 30 मिनट पूर्वी देशांतर माना गया है जो 5 राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश से होकर गुजरती है.   

भारत का भूगोल Geography of India in Hindi

 

भारत की जलवायु

 

भारत का भूगोल Geography of India in Hindi

 

जलवायु का अध्ययन जलवायु विज्ञान के अंतर्गत किया जाता है. जलवायु विज्ञान के अंतर्गत वायुमंडलीय दशाओं में मौसम व जलवायु का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है. मौसम वायुमंडल का अल्पकालिक अवस्था का अध्ययन है जबकि दीर्घकालिक अवस्था का ज्ञान जलवायु के अंतर्गत होता है. 30 वर्ष से अधिक एक विशाल क्षेत्र में मौसम की अवस्थाओं व विविधताओं का कुल योग जलवायु कहलाती है.

 

भारतीय मानसून की प्रकृति (Nature of Indian Mansoon)

1). मानसून का आरम्भ तथा उसका अग्रसरण

19 वीं सदी के अंत में यह व्याख्या की गयी थी कि गर्मी के महीनों में स्थल व समुद्र का विभेदी तापन ही मानसून पवनों के उपमहादीप की ओर चलने के लिए अनुकूल स्थिति उत्पन्न करती है. अप्रैल व मई के महीने में जब सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत चमकता है.

हिंद महासागर के उत्तर में स्थित विशाल भूखंड बहुत अधिक गर्म हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उपमहादीप के उत्तर- पश्चिमी भाग में एक गहन न्यून दाब क्षेत्र विकसित हो जाता है.

दक्षिणी- पश्चिमी मानसून केरल तट पर 1 जून तक पहुँचता है और जल्दी ही 10 और 13 जून के बीच ये आद्र पवनें मुंबई व कोलकाता तक पहुँच जाती हैं. 15 जुलाई तक संपूर्ण उप्माहदीप दक्षिण- पश्चिम मानसून से घिर जाता है.

 

2). वर्षावाही तंत्र व मानसूनी वर्षा

भारत में वर्षा लाने वाले 2 तंत्र होते हैं, पहला उष्ण कटीबंधीय अवदाब है, जो बंगाल की खाड़ी या उससे भी आगे पूर्व में दक्षिणी चीन सागर में पैदा होता है तथा उत्तरी भारत के मैदानी भागों में वर्षा करता है.

दूसरा तंत्र अरब सागर से उठने वाली दक्षिणी- पश्चिमी मानसून धरा है जो भारत के पश्चिम घाट के साथ साथ होने वाली अधिक्तार्वर्षा पर्वतीय है, क्योंकि यह आद्र हवाओं के अवरुद्ध होकर घाट के सहारे ऊपर उठने से होती है.

 

3). मानसून में विच्छेद

दक्षिण- पश्चिम मानसून काल में एक बार कुछ दिनों तक वर्षा होने के बाद यदि एक- दो या कई सप्ताह तक वर्षा ना हो तो इसे मानसून विच्छेद कहा जाता है. ये विच्छेद भिन्न भिन्न क्षेत्रों में विभिन्न कारणों से होते हैं.

* उत्तरी भारत के विशाल मैदान में मानसून का विच्छेद उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों की संख्या कम हो जाने से होता है.

* पश्चिमी तट पर मानसून विच्छेद तब होता है जब आर्द पवनें तट के समानांतर बहने लगें.

* राजस्थान में मानसून विच्छेद तब होता है जब वायुमंडल के निम्न स्तरों पर तापमान की विलोमता वर्षा करने वाली आर्द्र पवनों का ऊपर उठने से रोक देती है.

 

4). मानसून का निवर्तन

मानसून के पीछे हटने या लौट जाने को मानसून का निवर्तन कहा जाता है. 1 सितम्बर के आरम्भ से उत्तर- पश्चिम भारत में मानसून पीछे हटने लगती है और 15 अक्टूबर तक यह दक्षिणी भारत को छोड़ शेष समस्त भारत से निवर्तित हो जाती है.

लौटती हुई मानसून पवनें बंगाल की खाड़ी से जल- वाष्प ग्रहण करके उत्तर- पूर्वी मानसून के रूप में तमिलनाडु में वर्षा करती हैं.

 

बादल का फटना (Cloud Burst)

ग्रीष्मकाल में पर्वतीय भागों पर 2 तरफ से ऊपर की ओर चढने वाली हवाओं की टकराहट पहाड़ों के ऊपर होती है, जिससे तेज आवाज़ होती है जिससे खिडकियों के शीशे तक चटक जाते हैं, इसे बादल का फटना कहा जाता है.

2 आर्द्र वायु राशियों के मिलने से सापेक्षिक आर्द्रता अचानक बढती है, तीव्र गति से संघनन होता है, मूस्लाघार वर्षा होती है, जिससे भूमि स्खलन होता है और बस्ती, खेत और सड़कें तक नष्ट हो जाती हैं.

बादल का फटना एक प्राकृतिक घटना है जो घने कपासी क्षेत्र में घटित होता है जिसकी उंचाई सागर तल से 15 किमी. तक होती है. 16 जून 2013 को उत्तराखंड में बादल के फटने की घटना को सुनामी (Tsunami) नाम दिया गया.

 

भारतीय मानसून (Indian Monsoon)

 

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हिंद महासागर से आने वाली दक्षिणी गोलार्द्ध की पवनें भूमध्य रेखा को पार करके बंगाल की खाड़ी व अरब सागर में प्रवेश कर जाती हैं, जहाँ ये भारत के ऊपर विद्यमान वायु परिसंचरण में मिल जाती हैं.

भूमध्यरेखीय गर्म समुद्री धाराओं के ऊपर से गुजरने के कारण ये पवनें अपने साथ पर्याप्य मात्रा में आर्द्रता लाती हैं.

भूमध्य रेखा को पार करके इनकी दिशा दक्षिण- पश्चिमी मानसून कहा जाता है.

हिंद महासागर से दक्षिणी गोलार्द्ध में प्रविष्ट होकर अपने दाहिनी ओर मुड़कर सामान्य रूप से जब पहली जून को भारत की दक्षिणतम छोटी महेंद्रगिरि से टकराकर अचानक वर्षा करती हैं जिसे मानसून धमाका काहा जाता है.

दक्षिण- पश्चिम मानसून महेंद्रगिरि से टकराकर अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी 2 शाखाओं में बंटकर समूचे देश में वर्षा करती राजस्थान पहुँचती हैं.

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भारत की मिट्टी (मृदा)

प्रथ्वी के घरातल पर मिट्टियाँ असंघटित पदार्थों की एक परत है, जो अपक्षय और विघटन के कारकों के माध्यम से चट्टानों और जैव पदार्थों से बनी होती है.

अपक्षय और अपरदन के कारक भू-पृष्ठ की चट्टानों को तोड़कर उसका चूर्ण बना देते हैं. इस चूर्ण में वनस्पति तथा जीव- जंतुओं के गले-सड़े अंश भी सम्मिलित हो जाते हैं, जिसे हुमस कहते हैं.

चट्टानों में उपस्थित खनिज तथा चूर्ण में मिला हुआ हुमस मिलकर पेड़- पौधों को जीवन प्रदान करता है. मिटटी की प्राकृतिक क्षमता उर्वरता (Fertility )कहलाती है.

मृदा शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा क्र शब्द सोलम से हुई है जिसका अर्थ है फर्श (Floor) है. मृदा के वैज्ञानिक अध्ययन को पेडोलोजी कहते हैं.

 

1). जलोद मिटटी (Alluvial Soil)

भारत में पाई जाने वाली सभी मृदाओं में जलोद मिटटी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. इसके अंतर्गत भारत का लगभग 40% क्षेत्र सम्मिलित है. जलोद मृदा संपूर्ण विशाल मैदान में पाई जाती है.

यह मृदा हिमालय और निकटवर्ती क्षेत्रों से निकलने वाली सतलज, गंगा, ब्रह्पुत्र और उनकी सहायक नदियों के अवसाद के निक्षेपित होने से बनती है.

जलोद मिति पूर्वी तटीय मैदान में विशेष रूप से महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों के डेल्टा प्रदेश में पाई जाती है, इसलिए इसे डेल्टाई मिटटी के नाम से भी जाना जाता है.

जलोद मृदा में पोटाश की मात्रा अधिक तथा फास्फोरस की मात्रा कम होती है और इसका रंग हलके घूसर जैसा होता है.

 

2). काली या रेगूर मृदा (Black Soil)

क्रिटेशियस काल में बेसाल्तिक लावा के चादरीय निक्षेप तथा उनके विखंड से काल मृदा का निर्माण हुआ है. इसमें लोहे के अंश सापेक्ष अधिक होते हैं. काली मिटटी दक्कन के पठार की प्रमुख मृदा है. इस मिटटी का रंग काला होने के कारण इस काली मिटटी कहा जाता है. यह मिटटी गहरी व अपारगम्य होती है, गीली होने पर यह मिटटी फूल कर चिपचिपी हो जाती है और सूखने पर सिकुड़ जाती है.

शुष्क ऋतू में इन मृदाओं में चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं. यह ऐसा लगता है जैसे मिटटी में खुद ही जुताई हो गयी हो. नमी के धीमे अवशोषण व नमी क्षय की धीमी गति के कारण काली मिटटी में लम्बी अवधि तक नमी बनी रहती है. जिसके कारण फसलों को गर्मी में भी नमी मिलती है.

यह मिटटी कपास की खेती के लिए उपयुक्त होती है. कपास उत्पन्न किये जाने के कारण इस मिटटी को काली कपास मृदा भी कहा जाता है.

 

3). लाल- पीली मृदा (Red- Yellow Soil)

लाल- पीली मृदा का विकास उन क्षेत्रों में ज्यादा होता है जहाँ रवेदार आग्नेय चट्टानें पाई जाती हैं. पश्चिमी घाट के गिरीपद क्षेत्र की एक लम्बी पट्टी में लाल दोमट मृदा पाई जाती है. इस मिटटी का लाल रंग लौह के व्यापक विसरण के कारण होता है.

लाल मृदा जलयोजित होने के कारण पीली दिखाई पड़ती है. महीन कण वाली लाल व पीली मृदा उर्वरक होती हैं, इसके विपरीत मोटे कणों वाली मृदा अनुर्वरक होती है.

 

4). लैटेराईट मृदा (Leterite Soil)

लैटेराईट मृदा उच्च तापमान व भारी वर्षा के क्षेत्रों में विकसित होती है. ये मृदा उष्ण कटिबंधीय वर्षा के कारण तीव्र निक्षालन का परिणाम है. वर्षा जल के साथ चुना तथा सिलिका के कण निक्षालित हो जाते हैं तथा लोहे के ऑक्साइड व एलुमिनियम के कण मृदा में शेष रह जाते हैं.

इस मिटटी में नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा कैल्सियम की कमी होती है लेकिन लौह ऑक्साइड व पोटाश की अधिकता होती है. ये मिटटी पर्याप्त रूप से उपजाऊ नही होती. तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश व केरल में काजू जैसे वृक्षों वाली फसलों की खेती के लिए उपयुक्त होती है.

 

5). मरुस्थलीय मृदा (Desert Soil)

ये मृदा पश्चिमी राजस्थान, दक्षिणी हरियाणा, दक्षिणी पंजाब तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में पायी जाती है. हवा द्वारा उड़ाकर लाइ गयी ये रेतीली मिटटी सिंचाई की सुविधा मिल जाने पर अच्छी उपज दे सकती है.

इनमें खनिज लवण अधिक मात्रा में पाए जाते हैं किंतु ये जल में शीघ्र घुल जाते हैं. इन मिटटी में जीवांश की भी कमी होती है. शुष्कता अधिक होने के कारण इनका कृषि कार्यों में कम ही उपयोग होता है.

 

भारत की वनस्पति

 

भारत का भूगोल Geography of India in Hindi

 

पौधों के समूह को वनस्पति कहते हैं. प्राकृतिक वनस्पति में वे पौधे सम्मिलित किये जाते हैं जो मानव की सहायता के बिना जंगली अवस्था में उगते हैं. संरचना व पदार्थों में परिवर्तन करके ऐसे पौधे स्वंय को प्राकृतिक पर्यावरण के अनुकूल बना लेते हैं. प्राकृतिक वनस्पति पौधों का वह समुदाय है जिसमें लम्बे समय तक किसी प्रकार का हस्तक्षेप नही हुआ है.

मानव के हस्तक्षेप से रहित प्राकृतिक वनस्पति के उस भाग को अक्षत वनस्पति कहते हैं. सम्राट अशोक ने सडकों के किनारे वृक्ष लगवाये थे. मुगलों ने फलदार वृक्षों के विशिष्ट बाग़ भी लगवाये थे.

भारत में विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पतियाँ पाई जाती हैं. हिमालय पर्वतों पर शीतोष्ण कटिबंधीय वनस्पतियाँ उगती हैं. पश्चिमी घाट व अंडमान निकोबार दीप समूह में उष्ण कटिबंधीय वर्षा वन पाए जाते हैं.

डेल्टा क्षेत्रों में उष्ण कटिबंधीय वन, मैंग्रीव तथा राजस्थान में मरुस्थलीय और अर्घ- मरुस्थलीय क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की झाड़ियाँ, कैक्टस और कांटेदार वनस्पति पाई जाती हैं. मिटटी और जलवायु में विभिन्नता के कारण भारत के वनस्पतियों में भिन्नताएं पाई जाती हैं.

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भारतीय वनस्पतियों का वर्गीकरण

1). उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests)

ये वन भारत के उन भागों में पाए जाते हैं जहाँ औसत तापमान 24 डिग्री से ऊँचे तथा वर्षा 200सेमी. से अधिक होती है. इसलिए यहाँ ऐसे वृक्ष उगते हैं जो वर्ष भर हरे रहते हैं, इसलिए इन्हें सदाबहार वन कहते हैं.

ये वन बहुत घने होते हैं, इनमें 45 से 60 मीटर तक ऊँचे वृक्ष पाए जाते हैं. इन वनों में मुख्य रूप से ताड़, महोगनी, नारियल, एबोनी, आबनूस, बांस तथा बैत उगते हैं.

 

2). उष्ण कटिबंधीय पतझड़ वन (Tropical Deciduous Forests)

भारत में इस प्रकार के वन बहुतायात में पाए जाते हैं. ये वन भारत के उन भागों में पाए जाते हैं जहाँ वर्षा 100 से 200 सेमी. तक होती है.

ये वन गर्मी के प्रारंभ में ही अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं इसलिए इन्हें पतझड़ वाले या मानसूनी वन भी कहते हैं. ये वृक्ष अधिक लम्बे व सघन नही होते हैं.

इन वनों में साल, सागौन, शीशम, चंदन, आम, आंवला, महुआ व हल्दू के वृक्ष पाए जाते हैं.

इस प्रकार के वनों का विस्तार हिमालय के गिरीपद, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ तथा कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु के पश्चिमी घाट के पूर्वी ढालों पर, ओडिशा, पश्चिमी बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश तथा उत्तरांचल राज्यों में हैं. इन वनों की लकड़ी मुलायम व टिकाऊ होती हैं.

 

3). शुष्क मरुस्थलीय कांटेदार वन (Arid Thorny Forest)

इस प्रकार के वन भारत के शुष्क भागों में जहाँ वर्षा 50 सेमी. से कम हो वहां ये वन पाए जाते है. वृक्षों को वाष्पीकरण व पशुओं से बचाने के लिए प्रकृति ने कांटे दिए हैं.

इन भागों के वन छोटे- छोटे वृक्षों या कटीली झाड़ियों के रूप में होते हैं. इन वृक्षों की छाल मोटी तथा पत्तियों के साथ कांटे होते हैं.

मोटी छाल वृक्षों की गर्मी से रक्षा करती हैं. इन वनों में बबूल, खजूर, नागफनी, खेजडा, रीठा, केर, बेर, आंवला व करील के वृक्ष अधिक पाए जाते हैं. भारत में इस प्रकार के वनों का विस्तार राजस्थान, गुजरात, दक्षिण- पश्चिम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा भीतरी कर्नाटक में है.

 

4). वेलांचाली व अनूप वन (Littoral and Swamp Forest)

इस प्रकार के वन नदियों के डेल्टाओं में पाए जाते हैं, इसलिए इसे डेल्टाई वन कहते हैं. डेल्टाई भूमि समतल तथा नीची होने के कारण उनमें समुद्र का खारा जल प्रवेश कर जाता है अत इन भागों में सदाबहार के ज्वारीय वन मिलते हैं. समुद्र के खारे जल के प्रवाह से इन वृक्षों की लकड़ी कठोर तथा छाल क्षारीय हो जाती हैं. इनकी लकड़ी का उपयोग नांव बनाने तथा छाल का उपयोग चमड़ा पकाने तथा रंगने में किया जाता है.

इन वनों में ताड़, नारियल, फोनिक्स, नीपा, गोरने, मैन्ग्रोवा तथा सुन्दरी वृक्ष आते हैं.

ये वन गंगा- ब्रह्मपुत्र, महानदी, कृष्णा तथा कावेरी नदियों के डेल्टाओं में पायी जाती हैं. गंगा तथा ब्रह्मपुत्र के डेल्टा में सुन्दरी नामक वृक्ष पाया जाता है इसलिए इसे सुंदर वन का डेल्टा भी कहते हैं.

 

5). पर्वतीय वन (Mountainous Forests)

ये वन हिमालय पर्वत पर उगते हैं. इनका विस्तार असम से कश्मीर तक है. ये वन उंचाई के साथ- साथ बदलते रहते हैं क्योंकि उंचाई के साथ- साथ जलवायु के तत्वों की मात्रा में अंतर आता जाता है.

इनमें ओक, देवदार और मैपिल के वृक्ष उगते हैं. 1800 से 3000 मीटर की उंचाई तक समशीतोष्ण कोणधारी वन उगते हैं.

 

हिमालय प्रदेश की लकड़ियाँ (Woods of the Himalayan Region)

1). श्वेत सनोवर
2). देवदार
3). चीड
4). नीला पाइन
5). स्प्रूस
6). वालनट
7). विलो
8). बर्च
9). साइप्रस

 

मानसूनी वनों की लकड़ियाँ

1). सागोन
2). साल
3). चंदन
4). सुन्दरी
5). आबनूस

 

सदापर्णी वनों की लकड़ियाँ

1). रोज वुड
2). एबोनी
3). गुर्ज़न

 

भारत के वन्य जीव

वन्यजीव से तात्पर्य प्रत्येक प्रकार के पादप व जंतु से है, जो कि जंगलों, रेगिस्तान, चरागाहों में पाए जाते हैं. वन्य जीव संरक्षण व प्रबंध कार्यों के लिए संपूर्ण देश में राष्ट्रीय उधान, अभ्यारण तथा जैवमंडल रिजर्वों की स्थापना की गयी है. वन्य जीव के अंतर्गत जब किसी क्षेत्रीय प्राकृतिक इकाई में किसी विशेष जाती/ प्रजाति के वन्य प्राणी को संरक्षित किया जाता है तो उसे अभ्यारण कहते हैं.

जब जीवों के आवासीय प्रवास को संरक्षित किया जाता है तो उसे राष्ट्रीय उद्यान कहते हैं.

जब विशेष प्राकृतिक इकाई के समग्र पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित किया जाता है तो उसे जैवमंडल रिजर्व की संज्ञा दी जाती है.

 

विश्व विरासत स्थल (World Heritage Site)

मानवता के लिए अत्वंत महत्वपूर्ण स्थल, जो आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित की जानी होती हैं, उन्हें विश्व विरासत स्थल के रूप में जाना जाता है. ऐसे महत्वपूर्ण स्थलों के संरक्षण की पहल यूनिस्को द्वारा की गयी है. इसके लिए एक अन्तराष्ट्रीय संधि जो कि विश्व सांस्कृतिक व प्राकृतिक विरासत का संरक्षण करती हैं जो 1972 से लागू हुई है.

 

विश्व विरासत समिति के अंतर्गत 3 श्रेणियां

1). प्राकृतिक विरासत स्थल

ऐसी विरासत जो भौगौलिक प्राकृतिक निर्माण का परिणाम हो या भौतिक व भौगौलिक दृष्टि से अत्यंत सुंदर, वैज्ञानिक महत्व का स्थल, भौगौलिक महत्व वाली स्थल जो किसी विलुप्त जीव या वनस्पति का प्राकृतिक आवास हो.

 

2). सांस्कृतिक विरासत स्थल

इस श्रेणी की विरासत में स्मारक, स्थापत्य की इमारतें, मूर्तिकारी, चित्रकारी, स्थापत्य की झलक वाले शिलालेख, गुफा व वैश्विक महत्व वाले स्थान, इमारतों का समूह…..जो कि ऐतिहासिक, सौन्दर्य, जातीय, मानवविज्ञान या वैश्विक दृष्टि से ख्याति प्राप्त हो, को शामिल की जाती है.

 

3). मिश्रित विरासत स्थल

इस श्रेणी के अंतर्गत वे विरासत स्थल आते हैं जो कि प्राकृतिक व सांस्कृतिक दोनों रूप में महत्वपूर्ण होती हैं. भारत को विश्व विरासत सूची में 14 नवम्बर 1977 में स्थान मिला था.

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भारत के 7 प्राकृतिक विश्व विरासत स्थल

1). काजीरंगा नेशनल पार्क

यह असम के नागांव व गोलाघाट जिलों के मिकिर पहाड़ियों की तलहटी में ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी तट के साथ विस्तृत हैं. यह नेशनल पार्क एक सींग वाले (राइनोसेरोस) के लिए विश्व में जाना जाता है. यहाँ पर गैंडे की संख्या सबसे अधिक है. असम में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित इस पार्क में गैंडे के साथ साथ हाथी, चीता, बाघ, हिरन, डोल्फिन आदि हैं.

 

2). मानस वन्यजीव अभ्यारण

यह अभ्यारण असम में स्थित है. इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट के साथ साथ प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व, एलिफेंट रिजर्व आदि भी घोषित किया गया है. यह पार्क अपनी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है. इस अभ्यारण में एक सींग वाले गैंडे के साथ साथ हिमालयन भालू, बाघ, पिग्मी हॉग पाए जाते हैं.

 

3). केव्लादेवी नेशनल पार्क

यह राष्टीय उद्यान राजस्थान के भरतपुर जिले में हैं. 1982 में भरतपुर पक्षी अभ्यारण को नेशनल पार्क घोषित किया गया. इसका नाम बदलकर केवलादेव घना नेशनल पार्क रखा गया. इस पार्क में पक्षियों की लगभग 364 किस्मों का प्राकृतिक आवास है.

इसके अलावा यहाँ कछुआ, मछलियाँ, उभयचरों की कई प्रजातियाँ पाई जाती है. पक्षियों के अलावा काला हिरन, पायथन, सांभर, हिरन, नीलगाय पाए जाते हैं.

 

4). पश्चिमी घाट

यह क्षेत्र हिमालय के पर्वत से भी पुराने हैं. 1600 किमी. लम्बे पश्चिमी घाट की श्रेणी गुजरात में प्रारंभ होकर महाराष्ट्र, कर्नाटक होती हुई गोवा व केरल तक फैली है व कन्याकुमारी इसका अंतिम छोर है.

 

5). सुंदरवन नेशनल पार्क

पश्चिमी बंगाल के दक्षिणी भाग में गंगा नदी के सुंदरवन डेल्टा क्षेत्र में स्थित इस पार्क में रायल बंगाल टाइगर का निवास स्थल है. सुन्द्वन पार्क 2 नदियों ब्रह्पुत्र व गंगा से घिरा हुआ है.

 

6). नंदादेवी व वैली ऑफ़ फ्लावर

नंदादेवी नेशनल पार्क उत्तराखंड के नंदादेवी पर्वत पर स्थित है. यह क्षेत्र ऋषिगंगा के जल ग्रहण क्षेत्र में यह नदी धौली गंगा पूर्वी सहायक नदी है. जोशीमठ के पास घोलीगंगा व अलकनंदा का संगम इसी क्षेत्र में वैली ऑफ़ फ्लावर पार्क है. यहाँ भालू, कस्तूरी मुग, हिम तेंदुए, हिमालयन थार पाए जाते हैं.

 

7). ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क

ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र का प्रमुख आकर्षण है. यहाँ भालू, कस्तूरी हिरन, हिम तेंदुए, हिमालयन थार पाए जाते हैं. ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क कंजर्वेशन एरिया हेरिटेज साईट की सूची 2014 में शामिल किया गया.

 

साइट्स (CITES)

विलुप होते जीव- जंतुओं की सुरक्षा को लेकर विश्व के देशों ने 1973 में एक बहुपक्षीय संधि पर हस्ताक्षर किये थे, जिसे साइट्स कहते हैं. इस सम्मलेन का आयोजन प्रत्येक 3 वर्ष पर होता है.

 

साइट्स का विकास

साइट्स को वाशिंगटन कन्वेंसन भी कहा जाता है. इसके कारण 3 मार्च 1973 को ही इस संधि पर वाशिंगटन में हस्ताक्षर किये गये थे. इसका मुख्य उद्देश्य विश्व में ऐसा तंत्र बनाना है, जिससे विलुप्त हो रहे जीव- जंतुओं के व्यापार आदि पर रोक लगाया जा सके.

 

भारत की कृषि व पशुपालन

कृषि

कृषि के लिए अंग्रेजी में एग्रीकल्चर शब्द प्रयुक्त होता है, जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के 2 शब्दों से हुई है. एग्री जिसका अर्थ मृदा और कल्चर का अर्थ कृषि है. इस प्रकार कृषि का अर्थ फसल उगाने के लिए मिटटी की जुताई करना है.

 

मुख्य फसलें

चावल

चावल एक उष्ण कटिबंधीय फसल है व भारत की मानसूनी जलवायु में इसकी अच्छी कृषि की जाती है. यह देश की मुख्य खाधान फसल भी है. गर्म व आद्र जलवायु की उपयुक्ता के कारण इसे खरीफ की फसल के रूप में उगाया जाता है. देश में खाधान के अंतर्गत आने वाले कुल क्षेत्र में 47% भाग पर चावल की कृषि की जाती है.

 

चावल की फसलें

  1. अमन (शीतकालीन
  2. ऑस (शरदकालीन)
  3. बोरो (ग्रीष्मकालीन)

चावल उत्पादक क्षेत्र

पूर्वी भारत का मैदानी प्रदेश जिसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार तथा पश्चिमी बंगाल आते हैं.

 

गेंहू

चावल के बाद देश का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण खाघान है. देश की कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 10% भाग पर गेंहू की कृषि की जाती है, किंतु चावल की अपेक्षा इसका प्रति हेक्टेयर उत्पादन अधिक है. इसकी अधिकाँश कृषि सिंचाई के द्वारा की जाती है.

हरित क्रान्ति का सबसे अधिक प्रभाव गेंहू की खेती पर ही पडा है. इसके प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा में हरित क्रान्ति के प्रयोगों से उच्च उत्पादकता तथा उत्पादन की मात्रा अधिक प्राप्त की गयी है.

 

जौ

जौ की गणना मोटे अनाजों में की जाती है, किंतु यह भी देश की एक महत्वपूर्ण खाघान फसल है. यह शुष्क व बलुई मिटटी में बोया जाता है तथा शीत व नमी को अवशोषित करने की क्षमता भी अधिक होती है.

इसका प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश है जबकि बिहार राज्य के कृषि के 5% भाग पर जौ की खेती की जाती है.

 

ज्वार

ज्वार भी एक मोटा अनाज है जिसकी खेती सामान्य वर्षा वाले क्षेत्रों में बिना सिंचाई के की जाती है. इसके लिए उपजाऊ जलोढ़ अथवा चिकनी मिटटी काफी उपयुक्त है, किंतु लाल, पीली, हल्की व भारी दोमट तथा बलुई मिट्टियों में भी इसकी कृषि की जाती है.

 

बाजरा

बाजरा की गणना भी मोटे अनाजों में की जाती है और यह वास्तव में ज्वार भी शुष्क परिस्थितियों में पैदा किया जाता है. इसकी खेती के लिए 40 से 50 सेमी. तक की वर्षा व बलुई मिटटी उपयुक्त होती है. वर्षा की हल्की व लगातार होने वाली फुहारें इसके लिए काफी उपयुक्त होती हैं. राजस्थान व गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्त प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में बाजरे की खेती अधिक कृषि की जाती है.

 

मक्का

देश की अपेक्षाकृत शुष्क भागों में मक्का का उपयोग प्रमुख खाघान के रूप में किया जाता है. इसके लिए लंबा गर्मी का मौसम, खुला आकाश तथा अच्छी वर्षा आवश्यक होती है.

25 डिग्री सेंटीग्रेड से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान और 50 सेमी. तक की वर्षा वाले क्षेत्र तथा नाइट्रोज़न युक्त गहरी दोमट मिटटी में इसकी अच्छी खेती की जाती है. देश में मक्के का सर्वाधिक उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है.

 

दालें

शाकाहारी भोजन पसंद करने वाली जनसँख्या के लिए प्रोटीन प्राप्ति का सबसे प्रमुख साधन दालें हैं. देश में रबी बी खरीब दोनों फसलें के अंतर्गत दालों की खेती की जाती है.

रबी की फसल के समय बोई जाने वाली प्रमुख दलहनी फसलें हैं. अरहर, चना, मटर, मसूर आदि रबी की फसलें, जबकि मुंग, लोबिया आदि की खेती खरीफ के समय की जाती हैं.

 

दलहनी फसलें

दलहनी फसलों की दृष्टि से भारत की प्रमुख विशेषता यह है कि इनकी कृषि अनउपजाऊ मिटटी व वर्षा की भारी कमी वाले क्षेत्रों में ही की जाती है. चने की खेली गंगा तथा सतलज नदियों की उपरी घाटी व उसके समीपवर्ती मध्य प्रदेश राज्य तक सीमित है.

इसका सबसे सघन क्षेत्र उत्तर प्रदेश के आगरा तथा मिर्जापुर जिलों के बीच पाया जाता है, जबकि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात आदि प्रमुख उत्पादक राज्य हैं.

 

नकदी फसलें

गन्ना

संपूर्ण विश्व के गन्ना उत्पादक देशों में भारत का प्रथम स्थान है और यहाँ विश्व का लगभग 40% गन्ना पैदा किया जाता है.

गन्ने की फसल तैयार होने में लगभग एक वर्ष का समय लग जाता है और उपोष्ण कटिबंधीय फसल होने के कारण इसके लिए 20 डिग्री से 27 डिग्री का औसत वार्षिक तापमान तथा 100 सेमी. से 200 सेमी. की औसत वार्षिक वर्षा उपयुक्त होती है.गन्ने की फसल तैयार होते समय वर्षा का अभाव काफी लाभदायक होता है क्योंकि इससे शर्करा की मात्रा में वृद्धि हो जाती है.

समुद्रतटीय जलवायु वाले क्षेत्रों में जलवायविक समानता के कारण दक्षिण भारत का गन्ना काफी मोटा व अधिक रस वाला होता है, लेकिन मिटटी की अनुपयुक्तता के कारण इसकी सर्वाधिक खेती उत्तर भारत में ही की जाती है.

Indian Geography

 

रबड़

देश में रबड़ की खेती का प्रारंभ 1900 में मारक्किस ऑफ़ सेलिसबरी के प्रयासों से हुआ. इसी वर्ष ब्राजील के पारा क्षेत्र से रबर का बीज लाकर केरल में पेरियार नदी के किनारे लगाये गये. इसकी उत्तम खेती के लिए 25 से 32 डिग्री तक का तापमान, अत्यधिक वर्षा, लाल चिकनी दोमट मिटटी तथा अधिक मानव- श्रम की आवश्यकता होती है.

 

पशुपालन

भारत देश की अधिकाँश जनसँख्या शाकाहारी है. देश के अधिकाँश किसान एक या दो दुधारू पशु पालते हैं जो खुद के उपयोग हेतु दूध का उत्पादन करते हैं, किंतु किसान जो किसान अधिक दुधारू जानवरों को पालते हैं वो सरकार द्वारा चलाई जा रही सहकारी समितियों को भी दूध बेचते हैं.

दुग्ध उद्योग राज्य सूची में आता है, किंतु 1970 से एक ऑपरेशन फ्लड योजना शुरू की गयी जो कृषि व सहकारिता विभाग की देख- रेख में कार्य करती है.

 

गायों की नस्लें

  1. भारवाही नस्लें

ये नस्लें शक्तिशाली तथा मजबूत होती हैं. इनका उपयोग बैलगाड़ी खींचने, खेत में हल चलाने तथा सामान लाने ले जाने में किया जाता है. इस नस्ल की गायें दूध कम देती हैं.

  1. दुधारू नस्लें

इस नस्ल की गायें अधिक दूध देती हैं और इनके बछड़े भारवाही कार्य योग्य नही होते हैं.

  1. दिउद्देशीय नस्लें

इस नस्ल की गायें संतोषजनक मात्रा में दूध देती हैं तथा इनके बछड़े भी बोझा ढोने में कुशल होते हैं.

देशी नस्ल की गायें मुख्य रूप से 3 प्रकार की होती हैं.

* रेड सिन्धी
* साहीवाल
* गिर

 

भारत के खनिज संसाधन

खनिज एक प्रकार के प्राकृतिक संसाधन हैं जिनकी रचना एक से अधिक तत्वों के संयोजन व प्राप्त शेलों से होती है. भू- गर्भिक संपदा को खनन (गहराई के साथ की गयी खुदाई)/ उत्खनन (उपरी परत की खुदाई) के द्वारा प्राप्त किया जाता है. कम गहराई वाली खानों को खुली खदान तथा अधिक गहराई वाली खानों को कूप खदान कहते हैं.

 

भारत के प्रमुख खनिज

  1. उत्तरी पूर्वी प्रायदिपीय क्षेत्र

यह क्षेत्र भारतीय खनिज की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. इसे भारतीय खनिज का ह्रदय- स्थल कहा जाता है. इस क्षेत्र में काइनाइट 100%, लौह- अयस्क 93%, कोयला 84%, क्रोमाईट 70% आदि मिलते हैं.

  1. मध्य क्षेत्र

यह भारत का दूसरा सर्वाधिक खनिज क्षेत्र है. इसका विस्तार मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और पूर्वी महाराष्ट्र के क्षेत्र तक है.

इस क्षेत्र में मुख्यत मेंगनीज़, बाक्साइड, कोयला, लौहअयस्क, ग्रेफाइड, चूना- पत्थर आदि पाए जाते हैं.

  1. दक्षिण क्षेत्र

इस क्षेत्र में कर्नाटक का पठार और तमिलनाडु का उच्च क्षेत्र शामिल है. यहाँ लौह- अयस्क, मेंगनीज़, क्रोमाईट आदि खनिज प्राप्त होते हैं.

  1. उत्तरी- पश्चिमी क्षेत्र

इस क्षेत्र के अंतर्गत अरावली के क्षेत्र तथा गुजरात के भाग आते हैं. इसे युरेनियम, अभ्रक तथा खनिज तेल के क्षेत्र के रूप में जाना जाता है. यहाँ अलौह खानिजें, जिनमें मुख्य रूप से तांबा, सीसा, ज़स्ता आदि शामिल हैं.

 

प्रमुख खनिज़ संसाधन (Major Mineral Resource)

1). लौह अयस्क (Iron Ore)

देश में कुडप्पा तथा घारवाह युग की जलीय व आग्नेय शेलों में लौह अयस्क की प्राप्ति होती है. इनमें मैग्नेटाइट, लिमोनाइट तथा लैटेराइट अयस्क प्रमुख हैं. देश में सर्वाधिक शुद्धता वाला मैग्नेटाईट अयस्क (72% शुद्धता) पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है.

देश में उपलब्ध लौह अयस्क में से 85% हैमेटाईट, 8% मैग्नेटाईट और 7% अन्य किस्म का लोहा पाया जाता है.

 

2). मैंगनीज़

लौह इस्पात उद्योग में एक प्रमुख कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त होने वाली धातु मैंगनीज़ काले रंग की प्राकृतिक भस्मों के रूप में अवसादी चट्टानों में पायी जाती है. देश में मिलने वाले मेंगनीज़ अयस्क में दातु का अंश 52% तक पाया जाता है. मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र देश के प्रमुख मेंगनीज़ उत्पादक राज्य हैं.

यहाँ 15 किमी. चौड़ी तथा लगभग 205 किमी. लम्बी पेटी में मेंगनीज़ का जमाव है, जो पश्चिम में महाराष्ट्र के नागपुर व भंडारा जिलों तक विस्तृत है.

 

3). तांबा

देश में ताबे की प्राप्ति आग्नेय, अवसादी व कायांतरित तीनों प्रकार की चट्टानों में नसों के रूप में होती है, जिसमें कई प्रकार के पदार्थ मिले रहते हैं.

लाल व भूरे रंग का खनिज तांबा विधुत का उत्तम सुचालक होने के कारण विद्युत कार्यों में अधिक उपयोग में लाया जाता है. भारत में मिलने वाली तांबा खनिज की चट्टानों में शुद्ध धातु का अंश मात्र 1% से 3% तक ही पाया जाता है.

झारखण्ड का सिंहभूम जिला तांबा उत्खनन की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. यहाँ से ओडिशा राज्य तक लगभग 140 किमी. लम्बी पट्टी में तांबा खनिज मिलता है.

 

4). बाक्साइड

एलुमिनियम की प्राप्ति का श्रोत होने के कारण बाक्साइड की गणना महत्वपूर्ण खनिजों में की जाती है. इसकी प्राप्ति लौह भस्मों के रूप में होती है जिनमें प्रमुख हैं- बोमाइट, डायस्फोर तथा गिबराइट. देश में मिलने वाले ये सभी भस्म लैटेराईट प्रकार के हैं, जिनमें लाल व पीला लौहांश अधिक मात्रा में मिला रहता है.

 

5). सोना

सोने गणना बहुमूल्य घातुओं में की जाती है व इसका उपयोग अन्तराष्ट्रीय स्तर पर आदान- प्रदान के रूप में तथा आभूषणों के निर्माण में किया जाता है. यह कभी भी शुद्ध नही मिलता, इसमें चांदी व अन्य घातुओं के अंश मिले रहते हैं.

देश में सोने की बहुत कम मात्रा की प्राप्ति होती है जिसके कारण इसकी मांग व मूल्य दोनों ही अधिक हैं. देश के कुल स्वर्ण उत्पादन का लगभग 98% भाग अकेले कर्नाटक राज्य की कोलार तथा हट्टी की स्वर्ण खानों से प्राप्त किया जाता है.

 

6). अभ्रक

अभ्रक एक बहुउपयोगी खनिज है जो आग्नेय व कायांतरित चट्टानों में खण्डों के रूप में पाया जाता है. बायोटाइट अभ्रक का रंग गुलाबी होता है. अभ्रक के उत्पादन में देश का विश्व में प्रथम स्थान है. यहाँ से विश्व में मिलने वाली अच्छी किस्म की अभ्रक का 60% से भी अधिक उत्पादन किया जाता है और देश के उत्पादन का अधिकाँश भाग विदेशों को निर्यात कर दिया जाता है.

आंध्र प्रदेश में 67% संसाधन भंडार है, इसके बाद बिहार में 22%, राजस्थान में 8% तथा झारखंड में 3% है.

 

भारत का भूगोल आर्टिकल का निष्कर्ष

भारत का भूगोल इतना विस्तृत है कि मैं एक आर्टिकल में इसको बयान नही कर सकता….लेकिन फिर भी मेरी कोशिश रहेगी कि आपको अपने भारत देश के बारे में और भी जानकारी देता रहूँ, इसलिए मैं अभी इस आर्टिकल को यही समाप्त कर रहा हूँ और भविष्य में मैं इस आर्टिकल को अपडेट करता रहूँगा ताकि जो बाकी बचे टॉपिक हैं उनको भी यहाँ शामिल कर सकूँ.

 

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  1. Hindi Vishwa September 6, 2018

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