1857 की क्रांति विद्रोह/ 1857 Kranti Vidroh in Hindi

1857 Kranti Vidroh in Hindi

1857 की क्रांति विद्रोह/ 1857 Kranti Vidroh in Hindi

1857 का विद्रोह सिपाहियों के असंतोष का परिणाम मात्र नही था, वास्तव में यह औपनिवेशिक शासन के चरित्र, उसकी नीतियाँ, उसके कारण कम्पनी के शासन के प्रति जनता के संचित असंतोष का और विदेशी शासन के प्रति उनकी घ्रणा का परिणाम था.

एक शताब्दी से अधिक समय तक अंग्रेज इस देश पर धीरे धीरे अपना अधिकार बढ़ाते जा रहे थे, और इस काल में भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों में विदेशी शासन के प्रति जन- असंतोष तथा घ्रणा में वृधि होती रही. यही वह असंतोष था जिसका अंतिम रूप एक जनविद्रोह के रूप में उभरा.

1857 का विद्रोह ब्रिटिश नीतियों और साम्राज्यवादी शोषण के प्रति जन- असंतोष का उभार था, परन्तु यह आकस्मिक घटना नही था. लगभग एक शताब्दी तक पूरे भारत में ब्रिटिश आधिपत्य के विरुद्ध तीव्र जन- प्रतिरोध होते रहे थे.

 

क्रान्ति का पूर्वाभास

वेल्लोर क्रांति को 1857 की क्रांति का पूर्वाभास कहा जा सकता है. वेल्लोर क्रांति का नेतृत्व बक्वंत राव फडके ने किया था. इस संघर्ष का मूल कारण अंग्रेजों द्वारा भारतीय सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को आहत पहुँचाना था.

10 जुलाई 1806 ई. में विल्लोर के भारतीय सिपाहियों ने भीषण क्रांति कर दी और अंग्रेज संतरियों तथा अधिकारीयों की ह्त्या कर दी.

वेल्लोर दुर्ग पर मैसूर राज्य का झंडा फहरा दिया गया और ब्रिटिश राज्य को समाप्त करने की योजना बना ली गयी. लेकिन भारतीय सिपाही अनुशासनहीन भीड़ के सामान थे, इसलिए अंग्रेजी सेना उनके विद्रोह को कुचलने में सफल रही.

विफलता के बावजूद भी वेल्लोर क्रांति उस क्रांति की जंजीर की वह प्रथम कड़ी थी, जो 1857 की क्रांति के रूप में प्रकट हुई.

 

प्रथम स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख नेता

1). नाना साहब

 

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नाना साहब पेशवा बाजीराव के दत्तक पुत्र थे उनका वास्तविक नाम धुंधूपंत था था. अंग्रेजों ने उनकी 8 लाख रूपए की साल की पेंशन बंद कर दी और उन्हें पेशवा का उत्तराधिकारी भी मानने से इनकार कर दिया जिसके चलते अग्न्रेजों के विरुद्ध नाना साहब ने क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया.

संघर्ष के बाद उन्होंने कानपुर पर अधिकार कर लिया, स्वतंत्रता सेनानी के रूप में नाना साहब का नाम महानतम है.

 

2). तात्या टोपे

तात्या टोपे स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी थे, इनका वास्तविक नाम रामचंद्र पांडूरंग था. इन्होने अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 के स्वतंत्रता आन्दोलन को दीर्घकाल तक जारी रखा. अपनी सेना को लेकर इन्हें संकटकाल में जंगलों में छिपे रहना पड़ता था. अंग्रेजों ने अप्रैल 1859 ई. में इस महान देशभक्त को तोप से उडवा दिया था.

 

3). महारानी लक्ष्मीबाई

 

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लक्ष्मीबाई झांसी की महारानी थीं, इनके पति 1853 इ. में ही म्रत्यु को प्राप्त हो गये. लार्ड डलहोजी ने धोखे से झांसी के राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया. इस नीति से असंतुष्ट होकर रानी ने बड़ी वीरता के साथ अंग्रेजों से युद्ध किया तथा 1858 में ग्वालियर के किले में स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते हुए ही वीरगति को प्राप्त हुईं.

 

4). बाबू कुंवर सिंह

कुंवर सिंह बिहार में आन्दोलन की रणभेदी बजाने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी थे. इन्होने आजमगढ़ और वाराणसी में सफलताएँ प्राप्त की. अपने युद्ध कौशल और छापामार युद्ध नीति से इन्होने अंग्रेजों का सामना किया था. ब्रिटिश सेनानायक ने इन्हें पराजित करने का पूरा प्रयास किया, परंतु कुंवरसिंह गंगा नदी को पार कर प्रमुख क्षेत्र जगदीश पुर पहुँच गयी, वहां इन्होने अपने को स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया था.

 

5). बेगम हजरत महल

अवध राज्य भी बहुत विशाल और शक्तिशाली राज्य था. यहाँ पर बेगम हजरत महल ने क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया. बेगम हजरत महल साहसी, धेर्यवान और प्रबुद्ध महिला थीं. इन्होने राज्य के सम्मान को बचाने के लिए अंग्रेजों से संघर्ष किया. कुछ समय के लिए ये लखनऊ क्षेत्र को स्वतंत्र कराने में भी सफल हूँ. बेगम हजरत महल का नाम प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन की एक साहसी विभूति में प्रतिष्ठित है.

 

6). रानी अवंति बाई

मध्यप्रदेश की रियासत रामगढ़ की रानी अवन्ती बाई ने अंग्रेजी सेना से संघर्ष करने के लिए एक सशक्त सेना का निर्माण किया और क्रान्ति के दौरान युद्ध में अंग्रेजों से संघर्ष किया, बाद में रानी वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं.

1857 क्रांति के महत्वपूर्ण तथ्य

 

1857 के विद्रोह की विफलता के कारण

1). विद्रोहियों के पास कोई एक रूप विचारधारा नही थी. विद्रोहियों के नेतृत्वकर्ता विभिन्न वर्गों, विभिन्न हितों का प्रतिनिधित्व करते थे.

2). विद्रोह को अपनी परिणतितक पहुँचाने के लिए उन्होंने कोई सुनिश्चित कार्यक्रम नही बनाया था.

3). विद्रोह का प्रसार देशव्यापी ना होकर सीमित था. दक्षिण भारत व पूर्व भारत के अधिकतर क्षेत्र विद्रोह से अछूते थे. सिखों ने भी विद्रोहियों का साथ नही दिया.

4). भारत में एकता का अभाव था तथा विद्रोहियों को शिक्षित भारतीयों का सहयोग नही मिला.

5). विद्रोहियों को कुशल व सुयोग्य नेतृत्व नही मिला, जबकि ईस्ट इंडिया कंपनी को सुयोग्य सेनापतियों की सेवायें प्राप्त थीं.

1857 की क्रांति विद्रोह/ 1857 Kranti Vidroh in Hindi

 

1857: महत्वपूर्ण तिथियाँ

29 मार्च: कलकाता से 16 किमी. दूर बैरकपुर छावनी में 34विन नेटिव इनफैट्री के सिपाही मंगल पांडे ने गाय व चर्बी के कारतूस को चलाने से साफ़ इनकार कर दिया था.

8 अप्रैल: इस बगावत के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने बैरकपुर में सिपाही मंगल पांडे को फांसी दे दी तथा पूरी छावनी को सील कर दिया.

9 मई: मेरठ छावनी स्थित एक रेजिमेंट के 85 घुड़सवार सैनिकों ने रंगून से आये चर्बी युक्त कारतूसों को हाथ लगाने से भी मन कर दिया, जिसके बाद अंग्रेजी साम्राज्य ने इन सभी सैनिकों को बागी करार देते हुए उन्हें 10-10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाते हुए कारागार में डाल दिया.

10 मई: मेरठ छावनी की तीन रेजीमेंटों के सिपाहियों ने अंग्रेजी हुकूमत से बगावत कर वहां शस्त्रागार को लूट लिया, इसके बाद सैनिकों ने दिल्ली की ओर कूच कर दिया.

11 मई: दिल्ली पर क्रांतिकारियों का कब्ज़ा तथा अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह जफ़र को इस स्वतंत्रता संग्राम का नेता बनाने के बाद बादशाह-ए- हिन्दुस्तान के रूप में बहादुरशाह जफ़र की ताजपोशी की गयी.

12-31 मई: इस दौरान मुजफ्फरनगर, इटावा, मथुरा, लखनऊ, शाहजहांपुर, बरेली तथा अलीगढ में क्रान्ति भड़की.

30 मई: गाज़ियाबाद में क्रांतिकारियों व अंग्रेजी सेना के बीच हिंडन नदी के तट पर लड़ाई हुई, जहाँ अंग्रेजी सेना के कैप्टन व 11 सार्जेंट मारे गये व अंग्रेजी सेना को यहाँ से पीछे हटना पड़ा.

6 जून: कानपुर में नाना साहब ने अपने साथी क्रांतिकारियों के साथ क्रान्ति का बिगुल बजाते हुए कानपुर में डेरा डाला.

7 जून: झांसी के किले पर क्रांतिकारियों ने कब्जा कर रानी लक्ष्मीबाई का फिर से राज्यरोहण किया.

27 जून: नाना साहब ने अंग्रेजी हुकूमत से कानपुर जीत लिया और अंग्रेजी सेना को कानपुर से भागना पडा.

27 जुलाई: बिहार के आरा जनपद में कुंवरसिंह ने क्रांतिकारियों के साथ मिलकर वहां से अंग्रेजी सेना को पराजित कर अपना कब्ज़ा कर लिया.

13 अगस्त: जगदीशपुर में कुंवरसिंह की अंग्रेजी सेना से पराजय.

14 सितम्बर: दिल्ली का कश्मीरी गेट पर क्रांतिकारियों ने कब्ज़ा कर लिया तथा बारूद से उडाये. अंग्रेजी हुकूमत ने यहाँ पर भारी संख्या में गोला- बारूद इक्कठा कर रखा था.

20 सितम्बर: दिल्ली को अंग्रेजों ने फिर से अपने कब्जे में ले लिया.

21 सितम्बर: अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह जफ़र ने हुंमायूं के मकबरे पर अंग्रेजी सेना के सामने आत्मसमर्पण किया.

6 दिसम्बर: तात्या टोपे अंग्रेज अधिकारी कैंपवेल के हाथों पराजित होकर कानपुर से भाग निकले. इसके बाद वह झांसी पहुँच कर रानी लक्ष्मीबाई से जा मिले. यहाँ पर कालपी का युद्ध हुआ और यहाँ से भी तात्या को पीछे हटना पडा.

 

1857 की क्रान्ति के अन्य क्रांतिकारी

जफ़र बख्त खां

ये बरेली में सिपाहियों के विद्रोह का नेतृत्व किये थे. 3 जुलाई, 1857 को दिल्ली में बहादुरशाह जफ़र की सेना का वास्तविक सैन्य नेतृत्व किया. उन्होंने सिपाहियों के लिए न्यायलय की व्यवस्था की जिसमें हिंदू व मुस्लिम दोनों विद्रोही शामिल थे.

 

मौलवी अहमदुल्ला

फैजाबाद के मौलवी अहमदुल्ला ने भी 1857 के विद्रोह में अहम् भूमिका निभाई. वे मूल रूप से मद्रास के रहने वाले थे. जनवरी 1857 में वे फैजाबाद आये. लखनऊ पर अंग्रेजों का अधिकार हो जाने के बाद वे रोहिलखंड में विद्रोह का संचालन किये थे.

 

मंगल पांडे

भारत की आजादी की लड़ाई 1857 के विद्रोह के रूप में मंगल पांडे से हुई जब गाय व सूअर युक्त चर्बी वाले कारतूस लेने से मना कर 29 मार्च 1857 को दिए थे. इसी रेजीमेंट के अंग्रेज अधिकारी जनरल ह्यूस्टन को गोली मार कर ह्त्या कर दी जिसके परिणामस्वरूप उन पर कोर्ट मार्शल द्वारा मुकदमा चलाकर निर्धारत तिथि से 10 दिन पहले ही 8 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गयी. वे 1857 की क्रांति के प्रथम शहीद थे.

 

1857 के विद्रोह का परिणाम

1). नई शासन- नीति

2). कंपनी के शासन का अंत

3). भारतीय राजनीति में उग्रवाद का उदय

4). सेना का पुनर्गठन

5). भारतियों को लाभ

6). मुसलामानों के सांस्कृतिक जागरण पर बुरा प्रभाव

7). हिंदू- मुस्लिम वैमन्य का जन्म

8). भारतियों और अंग्रेजों के बीच पारस्परिक घ्रणा की उत्पत्ति.

 

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