सौर मंडल: अंतरिक्ष का अनोखा ज्ञान/ Saur Mandal (Solar System in Hindi)

सौर मंडल Saur Mandal Solar System in Hindi

सौर मंडल: अंतरिक्ष का अनोखा ज्ञान/ Saur Mandal (Solar System in Hindi)

सौर मंडल में 8 ग्रह हैं. नीहारिका को सौरमंडल का जनक माना जाता है. उसके नष्ट होने व क्रोड़ के बनने की शुरुआत लगभग 5 से 5.5 अरब वर्ष पूर्व हुई व ग्रह लगभग 4.5 से 4.4 अरब वर्ष पूर्व बनें.

सौर मंडल में सूर्य (तारा), 8 ग्रह, लाखों छोटे छोटे पिण्ड, घूमकेतु व भारी मात्रा में घूल कण, गैसें हैं.

2006 तक प्लूटो को भी एक ग्रह ही माना जाता था, किंतु अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने अपनी बैठक में यह निर्णय लिया कि कुछ समय पहले खोजे गये एक अन्य खगोलीय पिण्ड तथा प्लूटो बौने ग्रह की श्रेणी में आते हैं.

 

सूर्य (Sun)

सूर्य सौर मंडल का जनक, केंद्र व ऊर्जा का श्रोत है. यह हमारी मन्दाकिनी दुग्धमेखला के केंद्र से लगभग 30000 प्रकाश वर्ष की दूरी पर एक कोने में स्थित है.

सूर्य दुग्धमेखला मन्दाकिनी के केंद्र के चरों ओर 250 किमी./सेकंड की गति से परिक्रमा कर रहा है. इसका परिक्रमण काल 25 करोड़ वर्ष है, जिसे ब्रह्माण्ड वर्ष कहते हैं.

सूर्य अपने अक्ष पर पूर्व से पश्चिम की ओर घूमता है. इसका मध्य भाग 25 दिनों में व धुर्वीय भाग 35 दिनों में एक घूर्णन पूरा करता है. सूर्य अपने अक्ष पर 7 डिग्री का कोण बनाता है. सूर्य का व्यास 13 लाख 92 हज़ार किमी. है, जो प्रथ्वी के व्यास का लगभग 110 गुना है. सूर्य हमारी प्रथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है और प्रथ्वी को सूर्यताप का 22 अरब वॉ भाग मिलता है.

सूर्य प्रतिवर्ष 12 तारामंडलों से होकर गुजरता है. प्रत्येक माह सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण करता है, इसे संक्रांति कहते हैं. सूर्य जब मकर रेखा में प्रवेश करता है तो उसे मकर संक्रांति कहते हैं.

सूर्य एक गैसीय गोला है, जिसमें हाइड्रोजन 71%, हीलियम 26.5% व अन्य गैस 2.5% होता है.

सूर्य की वर्तमान आयु 4.7 अरब वर्ष है. पृथ्वी पर मिलने वाले 60 से अधिक तत्व सौर स्पेक्ट्रम में भी मिलते हैं.

 

सूर्य केंद्र व उसके धरातल स्तर

1). क्रोड़ (Core)

सूर्य का केन्द्रीय भाग कोर कहलाता है, जिसका तापमान 1.5*  C होता है. इस ताप पर परमाणु का विभाजन इलेक्ट्रानों व नाभिक में हो जाता है, जिससे प्लाज्मा का निर्माण हो जाता है.

हेंस बेथ के अनुसार इस तापमान पर सूर्य के केंद्र पर 4 हाईड्रोजन नाभिक मिलकर एक हीलियम नाभिक का निर्माण करते हैं. सूर्य के केंद्र पर नाभिकीय संलयन होता है जो सूर्य की ऊर्जा का श्रोत है.

 

2). विकिरण मेखला (Radiiative zone)

विकिरण मेखला क्रोड़ को चारों ओर से ढके हुए हैं. इस मेखला की चौड़ाई 3.82 लाख किमी. है. क्रोड़ में उत्पन्न ऊर्जा- वाहक फोटोन व एक्स तथा गामा किरणे इसकी सघन गैसीय मेखला से होकर गुजरती हैं.

 

3). संवहनीय मेखला (Convective zone)

विकिरण मेखला को घेरे हुए 1.39 लाख किमी. मोटाई वाली संवहनीय मेखला तीसरे स्तर का निर्माण करती है. कोशिकाओं से निर्मित इस मेखला में नीचे बड़ी तथा ऊपर छोटी कोशिकाएं पायी जाती हैं. इन्ही कोशिकाओं से होकर सौर उर्जा बाहर निकलती है.

 

सूर्य के घरातल से ऊपर 3 मंडल

1). प्रकाशमंडल (Photosphere)

सूर्य की दीप्तिमान सतह को प्रकाशमंडल कहते हैं, जिसका तापमान 6000 डिग्री होता है. प्रकाश कई रंगों से बना हुआ है, जिसमें से कुछ रंग प्राकशमंडल द्वारा अवशोषण कर लिए जाते हैं. प्रकाशमंडल द्वारा जहाँ- जहाँ प्रकाश के रगों का अवशोषण कर लिया जाता है, वहां काली रेखाएं बन जाती हैं.

इन काली रेखाओं को फौनहौफ़र रेखाएं कहते हैं. सौर कलंक भी प्रकाशमंडल में ही पाए जाते हैं. सौर कलंक का तापमान आस-पास के तापमान से 1500 डिग्री कम होता है. यह सूर्य के 5 से 40 डिग्री उत्तरी तथा दक्षिण अक्षांशों के मध्य उत्पन्न होते हैं.

इसके आन्तरित काले भाग को अम्ब्रा तथा चारों तरफ स्थित अपेक्षाकृत कम काले भाग को पेनम्ब्रा कहते हैं.

सौर कलंक अथवा सूर्य के धब्बों का एक पूरा च्रक 22 वर्षों का होता है. पहले 11 वर्षों तक यह धब्बा बढता है और बाद के 11 वर्षों तक यह घटता है, इसे सौर चक्र कहते हैं.

जब सूर्य की सतह पर घब्बा दिखाई पड़ता है, उस समय पृथ्वी पर चुम्बकीय तूफ़ान उत्पन्न होते हैं. इससे चुम्बकीय सुई की दिशा बदल जाती है व रेडियो, टेलीविजन, बिजली चालित मशीन आदि में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है.

नवीनतम शोधों के अनुसार सौरकलंक की उत्पत्ति पृथ्वी पर जलवायु की दशा को बहुत हद तक प्रभावित करती है.

विषुवत रेखा के साथ अलनीनो गर्म जलधारा का भी सौरकलंक से संबंध होता है. सौरकलंक की गति के आधार पर सर्वप्रथम गैलीलियो ने बताया कि सूर्य अपने अक्ष पर घूर्णन करता है.

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2). वर्णमंडल (Chromosphere)

प्रकाश मंडल के किनारे प्रकाशमान नही होते, क्योंकि सूर्य का वायुमंडल प्रकाश का अवशोषण कर लेता है, इसे वर्णमंडल कहते हैं.

यह लाल रंग का होता है तथा प्रकाशमंडल के ऊपर एक आवरण के रूप में 2000 से 3000 किमी मोटाई में फैला होता है. गर्म गैसों से निर्मित इस मंडल में गैसों का घनत्व प्रकाशमंडल की अपेक्षा कम होता है तथा ताप अधिक होता है.

वर्णमंडल का आरम्भ प्रकाशमंडल की उस उपरी परत से होता है जहाँ ऋणात्मक हाईड्रोजन कम हो जाते हैं. वर्णमंडल में गैसों के उठते प्रवाह को कंटिका कहा जाता है, जो कोरोना तक पहुँच जाती है.

कभी- कभी इस मंडल में तीव्र गहनता का प्रकाश उत्पन्न होता है, जिसे सौर ज्वाला कहते हैं. सौर ज्वाला से X-RAY तथा Y-RAY निकलती हैं और इसमें पदार्थ औसतन 800 किमी./से. की दर से बाहर फैंका जाता है.

सौर ज्वाला को उत्तरी ध्रुव पर औरोरा बोरियलिस और दक्षिणी ध्रुव पर औरोरा ऑस्ट्रेलिस कहते हैं.

 

3). कोरोना (Corona)

सूर्य ग्रहण के समय सूर्य के दिखाई देने वाले भाग को कोरोना कहते हैं. यह सूर्य के वायुमंडल का सबसे बाहरी आवरण है, जो वर्णमंडल के ऊपर पाया जाता है. इसका विस्तार कई मिलियन किमी. तक है. बाहर की ओर यह आयन और इलेक्ट्रान की हवाओं में बदल जाते हैं.

सौर मंडल से होकर प्रभावित होने वाली इस पवन को सौर पवन (Solar Wind) कहा जाता है. कोरोना से लाल रंग की लपटें चाप (Arch) का निर्माण करती कोरोना में ही प्रवेश कर जाती हैं, जिसे प्रोमिनेंस कहते हैं.

सूर्य के ध्रुवीय भागों के ऊपर कोरोना में एक छिद्र होता है, जिसे कोरोना होल कहा जाता है. पूर्ण सूर्य ग्रहण के समय कोरोना से ही प्रकाश की प्राप्ति होती है.

 

सौर मंडल के 8 ग्रह

1). बुध (Mercury)

सूअरमंडल से प्लूटो के निष्कासन के बाद यह सबसे छोटा ग्रह है, जिसके पास कोई उपग्रह नही है. यह सूर्य का सबसे नजदीकी ग्रह है. सूर्य से इसकी दूरी 5.8 करोड़ किमी. है. इसका व्यास 4880 किमी. तथा घनत्व 5.5 है.

यह सौर मंडल का सर्वाधिक कक्षीय गति वाला ग्रह है जो 48 किमी. प्रति सेकंड की गति से सूर्य की परिक्रमा सबसे कम समय (88 दिन) में पूरा कर लेता है. इसकी अक्षीय अवधि 58.65 दिन है.

यह सूर्य निकलने के दो घंटा पहले दिखाई पड़ता है तथा सूर्यास्त के कुछ पहले अस्त होता है इसलिए प्राचीन विद्वान् इसे दो ग्रह समझते थे व उदय वाले बुध को अपोलो तथा शाम वाले ग्रह को मरकरी कहते थे.

शुक्र के अलावा बुध को भी भोर व सांय का तारा कहा जाता है. बुध सुबह व शाम में तारे के रूप में वर्ष में 3 बार ही दिखाई देता है, जिसका कारण इसकी साईंनौडिक अवधि का 116 दिन का होना है. अधिक ताप व कम पलायन वेग के कारण बुध पर वायुमंडल का अभाव है.

इसके चारों ओर हाईड्रोजन का एक क्षीण आवरण है. विरल हाइड्रोजन के कारण सौर पवनों का ग्रह के साथ अंतक्रिया है. वायुमंडल के अभाव के कारण बुध पर जीवन संभवनही है क्योंकि यहाँ दिन अति गर्म व रातें बर्फीली होती हैं.

इसका तापान्तर सभी ग्रहों में सबसे अधिक है. बुध का एक दिन पृथ्वी के 90 दिन के बराबर होता है. इसका द्रव्यमान पृथ्वी का 1/18 है.

इसका क्रोड़ लोहे का बना है. पृथ्वी और सूर्य के मध्य से बुध ग्रह के गुजरने को बुध का पारगमन कहा जाता है.

7 मई, 2003 को यह खगोलीय घटना संपूर्ण भारत में देखी गयी थी. 13 नवम्बर 2032 को बुध पारगमन की घटना संपूर्ण भारत में देखी जा सकेगी. एक सदी में 13 बार यह खगोलीय घटना घटती है.

बुध और पृथ्वी की कक्षा जिस बिंदु पर इस रेखा को काटती है उसे संक्रांति बिंदु कहते हैं. यह सूर्य चारों ओर परिक्रमा करते हुए, जब पृथ्वी और बुध एक ही समय पर इस बिंदु के निकट आ जाते हैं, तब बुध पारगमन की खगोलीय घटना घटती है.

इस समय सूर्य पर बुध काले बिंदु की तरह दिखाई देता है. बुध के सबसे पास से गुजरने वाला कृत्रिम पुगारह मैरिनर- 10 था, जिससे लिए गये फोटों से पता चला कि इसकी सतह पर अनेक पर्वत, क्रेटर और मैदान हैं.

सूर्य और पृथ्वी के बीच में होने के कारन बुध तथा शुक्र को अंतर्ग्रह (Interior Planets) भी कहते हैं.

 

2). शुक्र (Venus)

यह पृथ्वी का सर्वाधिक निकटतम ग्रह है जिसकी दूरी पृथ्वी से लगभग 4 करोड़ किमी. है. इसका औसत व्यास 12102 किमी. तथा औसत घनत्व 5.2 है.

यह सूर्य से दूसरा निकटवर्ती ग्रह है व सूर्य की प्रदक्षिणा 35 किमी./से. की गति से 225 दिनों में पूर्ण करता है.

यह अपने अक्ष पर 243 दिन मैं एक घूर्णन पूरा कर्ता है, शुक्र अपने अक्ष पर विपरीत दिशा में अर्थात पूरब से पश्चिम घूर्णन करता है.

यह सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह है, जिसका तापमान 475 डिग्री है. सूर्य प्रकाश को परावर्तित करने की क्षमता 70% होने के कारण यह सौरमंडल का सर्वाधिक चमकीला ग्रह है. यहाँ सूर्योदय पश्चिम दिशा में होता है.

इसके वायुमंडल में 96% कार्बन डाई ऑक्साइड, 3.4% नाइट्रोजन, 0.015% सल्फर डाइऑक्साइड व अन्य विरल गैसें पायी जाती हैं.

अधिक ताप तथा कार्बन डाई ऑक्साइड की अधिकता के कारण यहाँ प्रेशर कुकर की दशा उत्पन्न होती है. यही कारण है कि शुक्र को प्रेशर कूकर की दशा उत्पन्न होती है.

द्रव्यमान तथा आकार में पृथ्वी से थोडा ही कम होने के कारण इसे पृथ्वी की बहन ग्रह या पृथ्वी का भगिनी ग्रह कहा जाता है.

इसको सांझ का तारा और भोर का तारा भी कहते हैं क्योंकि यह शाम को पश्चिम दिशा तथा सुबह पूर्व की दिशा में आकाश में दिखाई देता है.

शुक्र पर सक्रिय ज्वालामुखी पाए जाते हैं, जिसके कारण इसके वायुमंडल में सल्फर डाईऑक्साइड के घने बादल पाए जाते हैं.

इसका केंद्र लोहे व निकेल का बना है तथा बुध के समान इसका अपना कोई उपग्रह नही है.

 

3). पृथ्वी (Earth)

पृथ्वी सूर्य से दूरी के क्रम में तीसरा तथा आकार में पांचवां सबसे बड़ा ग्रह है. यह शुक्र और मंगल के बीच स्थित है. इसका भूमध्य रेखीय व्यास 12755.6 किमी., घ्रुवीय व्यास 12714 किमी. तथा धुर्वीय परिधि 40008 किमी. व भूमध्य रेखीय परिधि 40076 किमी. है.

सूर्य से इसकी औसत दूरी 15 करोड़ किमी. है. पृथ्वी अपने अक्ष पर 23 ½ डिग्री झुकी हुई है. यह अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व 1610 किमी प्रति घंटा की चाल से 23 घंटे 56 मिनट 9.54 सेकेंड में एक चक्कर पूरा करती है.

पृथ्वी की इस गति को घूर्णन या दैनिक गति कहते हैं. इस गति से दिन और रात होते हैं. पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 46 सेकेंड का समय लगता है.

सूर्य की चारों ओर पृथ्वी के इस परिक्रमा को पृथ्वी की वार्षिक गति अथवा परिक्रमण कहते हैं. पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा करने में लगे समय को सौर वर्ष कहा जाता है.

प्रत्येक सौर वर्ष, कैलेण्डर वर्ष से लगभग 6 घंटा बढ़ जाता है, जिसे हर चौथे वर्ष में लीप वर्ष बनाकर समायोजित किया जाता है. लीप वर्ष 366 दिन का होता है, जिसके कारण फरबरी माह में 28 के स्थान पर 29 दिन होते हैं. पृथ्वी पर ऋतू परिवर्तन, इसके 22 ½ डिग्री अक्ष पर झुके होने के कारण तथा सूर्य के सापेक्ष इसकी स्थिति में परिवर्तन अर्थात वार्षिक गति के कारण होती है. वार्षिक गति के कारण ही पृथ्वी पर दिन रात छोटा बड़ा होता है.

आकार व बनावट की दृष्टि से पृथ्वी शुक्र के समान है. पृथ्वी चारों ओर से वायु द्वारा घिरी हुई है, जिसके विस्तृत क्षेत्र को वायुमंडल कहा जाता है. वायुमंडल अनेक गैसों का मिश्रण है, जिसमें ठोस व तरल पदार्थों के कण असमान मात्राओं में तैरते हैं.

पृथ्वी चारों ओर मध्यम तापमान, ऑक्सीजन और प्रचुर मात्रा में जल की उपस्थित के कारण यह सौरमंडल का अकेला ऐसा ग्रह है जहाँ जीवन है.

अंतरिक्ष से यह जल की अधिकता के कारण नीला दिखाई देता है, इसलिए इसे नीला ग्रह भी कहा जाता है. पृथ्वी का अक्ष इसकी कक्षा के सापेक्ष 66 ½ डिग्री का कोण बनता है.

सूर्य के बाद पृथ्वी के सबसे निकट का तारा प्राकिसमा सेंचुरी है, जो अल्फ़ा सेंचुरी समूह का एक तारा है. यह पृथ्वी से 4.22 प्रकाश वर्ष दूर है. पृथ्वी का एक उपग्रह चंद्रमा है. चंद्रमा से पृथ्वी की औसत दूरी 384400 किमी. है.

 

4). मंगल (Mars)

मंगल सौरमंडल में सूर्य से दूरी के क्रम में 4वें व आकार में 7वें स्थान पर आता है. इसकी सूर्य से दूरी 22.79 करोड़ किमी., व्यास 6.794 किमी तथा घनत्व 3.93 ग्राम/ घन सेमी है.

यहाँ पृथ्वी के समान 2 घ्रुव हैं तथा इसकी कक्षा 25 डिग्री के कोण पर झुका हुआ है, जिसके कारण यहाँ पृथ्वी के समान ऋतू परिवर्तन होता है.

यह अपने अक्ष पर 24 घंटे 37 मिनट व 23 सेकंड में एक घूर्णन चक्र पूरा करता है. इसके दिन का मान व अक्ष का झुकाव पृथ्वी के समान है.

इसके घरातल का औसत तापमान 23 डिग्री है. सूर्य की परिक्रमा करने में इसे 687 दिन लगते हैं. इसके वायुमंडल में 95% कार्बन डाइ ऑक्साइड, 2 से 3% नाइट्रोजन, 1 से 2% आर्गन तथा 0.1 से 0.4% ओक्सीजन पाया जाता है.

इसके वायुमंडल में ओजोन स्तर का अभाव पाया जाता है.नासा के वैज्ञानिकों ने मंगल के वातावरण मैं मीथेन की उपस्थिति की पहचान करने में वर्ष 2009 में सफलता प्राप्त की है.

इसकी मिटटी में लगभग 10% आयरन ऑक्साइड पाया जाता है, जो इस ग्रह को इसका विशिष्ट लाल स्वरूप प्रदान करता है.

मंगल का सतह लाल होने के कारण इसे लाल ग्रह भी कहते हैं. मंगल ग्रह के अध्ययन हेतु 1997 में अमेरिका ने मानव निर्मित पहला अंतरिक्ष यान पाथ फाइंडर को सफलतापूर्वक मंगल के धरातल पर उतारा.

इसके अध्ययन हेतु समय समय पर नासा ने मार्स ग्लोबस तथा मार्स ओडिसी तथा फिनिक्स मार्क्स लैंडर का प्रमोचन किया.

जनवरी 2007 में मार्स एक्सप्रेस द्वारा भेजे गये चित्रों व प्रतिध्वनि से मंगल पर बर्फ और हिमशीतल जल की उपस्थिति की पुष्टि हुई है.

भारत ने भी मंगल पर अध्ययन हेतु मंगलयान 2013 में भेजा था. पृथ्वी के अलावा यह एक मात्र ग्रह है जिस पर जीवन की संभावना व्यक्त की जाती है.

फोबोस और डीमोस मंगल के दो उपग्रह हैं. मंगल का धरातल बीहड़ क्रेटर युक्त तथा बहुत कुछ चंद्रमा के सद्रश्य है.

सौरमंडल का सबसे बड़ा ज्वालामुखी ओलिपस मेसी व सौरमंडल का सबसे ऊँचा पर्वत निक्स ओलंपिया है जो माउंट एवेरेस्ट से 3 गुना अधिक ऊँचा है.

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5). वृहस्पति (Jupiter)

वृहस्पति सौरमंडल में आकार में सबसे बड़ा व सूर्य से दूरी में 5 वें स्थान पर है. सूर्य से इसकी औसत दूरी 77.8 करोड़ है तथा इसका व्यास 142984 किमी है.

यह अपने अक्ष पर सौरमंडल का सबसे तेज़ गति से घूर्णन करने वाला ग्रह है, जो अपने अक्ष पर 9 घंटे 55 मिनट में एक बार चक्कर लगा लेता है.

इसकी परिक्रमण अवधि 11.86 वर्ष है तथा इसका धरातलीय गुरुत्व पृथ्वी से अधिक है. इसका पलायन वेग सौरमंडल का सर्वाधिक 59.2 किमी है.

इसका औसत घनत्व 1.33 ग्राम/घन-सेमी है और इसकी भूमध्यरेखा इसके कक्षीय प्लेन के साथ 3 डिग्री का कोण बनाती है. इसके धरातल का औसत तापमान -23 डिग्री पाया जाता है.

इसके वायुमंडल में हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन तथा अमोनिया जैसी हल्की गैसें पायी जाती हैं. यहाँ का वायुमंडलीय दाब पृथ्वी के वायुमंडलीय दाब की तुलना में 1 करोड़ गुना अधिक है.

वृहस्पति सूर्य से प्राप्त ऊर्जा का 2.5 गुना उर्जा इन्फ्रारेड तरंगदैधर्य के रूप में अंतरिक्ष में विसर्जित करता है. इसके ऊर्जा का स्रोत ग्रह के अन्दर स्थित उर्जा- भण्डार है जो इसके निर्माण के समय निक्षिप्त हुआ था.

यह तारा और ग्रह दोनों के गुणों से युक्त होता है क्योंकि इसके पास खुद की रेडिओ ऊर्जा है. इसी कारण इसे तारा सद्र्श्य ग्रह कहा जाता है.

इसे मास्टर ऑफ़ गोडस की भी उपमा प्रदान की जाती है. सौर मंडल में वृहस्पति के मान्य उपग्रहों की संख्या 63 हो गयी है. गैनिमिड सौरमंडल का सबसे बड़ा उपग्रह है जिसका व्यास 5260 किमी है.

आयो युरोपा, कैलिस्टो, मेटिस, हिमालय, पारसीफाई, अलमथिया आदि इसके अन्य उपग्रह हैं. उपग्रहों सहित वृहस्पति को लघु सौर- तंत्र भी कहा जाता है.

वृहस्पति जब पृथ्वी के सर्वाधिक न्यूनतम दूरी पर आती है तो इस स्थिति को ‘द नाइट ऑफ़ ओपोजिशन’ कहते हैं, क्योंकि वृहस्पति सूर्य के निकट होता है. यह घटना 50 साल में सिर्फ एक ही बार होती है.

Solar system Information

 

6). शनि (Saturn)

शनि आकार में सौर मंडल का दूसरा सबसे बड़ा तथा सूर्य से दूरी के क्रम में 6 वां ग्रह है, जो आकाश में पीले तारे के समान दिखाई देता है. इसका औसत व्यास 120000 किमी है तथा सूर्य से औसत दूरी 142.66 करोड़ है. इसका औसत घनत्व 0.7 ग्राम/घन सेमी है, जो सभी ग्रहों में सबसे कम है.

नासा के अनुसार यह ग्रह 26 डिग्री 73 मिनट झुका हुआ है तथा अपने अक्ष पर यह 10 घंटा 34 मिनट में एक बार घूर्णन कर लेता है. यह सूर्य की परिकृमा 29.4 वर्षों में पूरा करता है और इसके घरातल का तापमान 178 डिग्री है.

शनि का पलायन वेग 36 किमी/ सेकेंड है, इसलिए इस पर हल्की गैसें नही पायी जाती हैं. इसके वायुमंडल में हाइड्रोजन, मीथेन, हीलियम व अमोनिया गैसें मिलती हैं.

इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसके मघ्यरेखा के चारों ओर पूर्ण विकसित वलयों का होना है, जिसकी संख्या 7 है. इन्ही छल्लों की विशिष्टता के कारण इसे आकाशगंगा सद्रश ग्रह भी कहा जाता है.

शनि ग्रह के छल्ले कुछ समय के लिए लुप्त प्रतीत होते हैं, जिसे रिंग-क्रोसिंग कहते हैं. यह अनोखी खगोलीय घटना प्रत्येक 14.7 वर्ष में घटित होती है. हाल ही में यह घटना सितम्बर 2009 में देखने में आयी थी और अब आगे मार्च 2025 में घटित होगी.

वर्ष 2009 में नासा द्वारा स्पित्जर दूरबीन की सहायता से शनि के 8 वें वलय की खोज की गयी है, जो सौरमंडल का सबसे बड़ा वलय है. इस वलय की सीमा में शनि का बाह्य उपग्रह फ़ोबे स्थित है, जो इसकी कक्षा में घुमने के विपरीत दिशा में परिक्रमा करता है.

शनि का सबसे बड़ा उपग्रह टाइटन है, जो आकार में बुध ग्रह के बराबर है. टाइटन का व्यास 5150 किमी है और सौर मंडल का यही एक मात्र उपग्रह है, जिसके पास अपना स्थायी वायुमंडल है. इसके वायुमंडल में नाइट्रोजन व मीथेन गैसें पाई जाती हैं.

शनि का दूसरा सबसे बड़ा उपग्रह रिया है, जिसका व्यास 1530 किमी है.

 

7). अरुण (Uranus)

अरुण आकार में सौरमंडल का तीसरा और दूरी में 7 वें स्थान पर है, इसकी खोज 1781 में विलियम हर्शले ने की थी.

इसका व्यास 51800 किमी है तथा सूर्य से औसत दूरी 286.9 करोड़ किमी है. इसका द्रव्यमान पृथ्वी से 14.54 गुना अधिक है तथा इसका औसत घनत्व 1.30 ग्राम/घन सेमी है.

अरुण का अक्षीय झुकाव 97 डिग्री है जिस कारण यह लेटा हुआ सा दिखाई देता है, इसलिए इसे ‘लेटा हुआ ग्रह’ भी कहते हैं.

यह अपने अक्ष पर लगभग 10 घंटे 48 मिनट में एक चक्कर लगा लेता है और शुक्र की तरह अरुण भी अपने अक्ष पर पूर्व से पश्चिम दिशा में चक्कर लगाता है इसलिए ही शुक्र व अरुण दोनों पर सूर्योदय पश्चिम की ओर से ही होता है.

धुर्वीय प्रदेश में इसे सूर्य से सबसे अधिक ताप तथा प्रकाश मिलता है. अरुण सूर्य की एक परिक्रमा करने में 84 वर्ष का समय लगाता है. दूरबीन से देखने पर अरुण हरी डिस्क के रूप में दिखाई देता है.

इसकी सतह का तापमान 218 डिग्री है. इसके वायुमंडल में मीथेन व हाइड्रोजन का संकेद्र पाया जाता है. इसकी आंतरिक संरचना वृहस्पति व शनि से मिलती जुलती है. इसके कुल उपग्रहों की संख्या 27 है. फार्ड़ेलिया अरुण का सबसे छोटा उपग्रह है जो सभी पृथ्वी की विपरीत दिशा में परिभ्रमण करते हैं.

 

8). वरुण (Neptune)

वरुण ग्रह की खोज जर्मन खगोलविद जोहान गाले ने 1846 में की थी. यह सूर्य से 8 वां दूरस्थ ग्रह है जो आकार में अरुण से भी छोटा है. वरुण पर वायुमंडल अत्यधिक सघन है यहाँ हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन व अमोनिया पायी जाती हैं.

यहाँ का तापमान -235 डिग्री है जहाँ जीवन की कोई भी संभावना नही रह सकती. यह हरे रंग का दिखाई देता है. वरुण के कुल 14 उपग्रह हैं और इसका सबसे बड़ा उपग्रह ट्रीटान है. वरुण की सूर्य से दूरी 149798000 किमी है और यह सूर्य की परिक्रमा 164.79 वर्ष में पूरी करता है.

 

बौने ग्रह (Dwarf Planet)

I.A.U. ने ओस्लो बैठक 2009 के बाद कहा कि वरुण ग्रह के बाद या उससे दूर की कोई भी अगर गोलाकार वस्तु होगी जिसमें गुरुत्वाकर्षण बल के साथ साथ न्यूनतम निर्धारित चमक होगी उसे प्लुटोइड कहा जाएगा.

 

1). यम/ कुबेर (Pluto)

24 अगस्त 2006 की अन्तराष्ट्रीयखगोलीय संघ के सम्मलेन में ग्रह कहलाने के मापदंड पर खरे नही उतरने के कारण यम या कुबेर को ग्रह की श्रेणी से अलग कर बौने ग्रह की श्रेणी में रखा गया है. यम को ग्रह की श्रेणी से निकाले जाने के बहुत से कारण है जैसे….

* आकर में चंद्रमा से छोटा होना.

* इसकी कक्षा का वृताकार ना होना.

* वरुण की कक्षा को काटना

 

2). सेरस (Ceres)

सेरस की खोज 1801 में इटली के खगोलविद गुसेपी पियाजी ने की थी तथा इसको भी बौने ग्रहों की श्रेणी में ही रखा गया है जिसका व्यास 1025 किमी है.

 

3). इरिस (Eris)

इरिस की खोज 1898 में हुई थी जिसका आकार अनियमित है और यह 23 किमी लम्बा व 11 किमी चौड़ा है. अमेरिका का उपग्रह नियर शूमेकर 2001 में इरिस पर उतरा था. किसी बौने ग्रह पर मानव निर्मित उपग्रह उतारना एक आश्चर्यजनक घटना रही है.

 

धूमकेतु या पुछल्ल तारा (Comets)

धूमकेतु या पुच्छल तारा वे आकाशीय पिण्ड हैं जो धुल, बर्फ, जलकणों और हिमानी गैसों की चट्टानों तथा धातु के पिण्डों से बना हुआ है, जो सूर्य के चारों ओर लम्बी और अनियमित कक्षा से घूमते रहते हैं. ये पृथ्वी से भी कुछ दिनों तक आँखों से भी देखे जा सकते हैं.

पुच्छल तारा धरती से तभी दिखाई देता है जब वो सूर्य की और बढ़ता है जिसकी रौशनी से इसकी गैसें चमकने लगती हैं.

धूमकेतु की पूंछ हमेशा ही सूर्य की विपरीत दिशा में रहती है. धूमकेतु की खोज सबसे पहले टाइको ब्राहे ने की थी.

हेली नामक धूमकेतु का परिक्रमण काल 76 वर्ष है और यह अंतिम बार 1986 में दिखाई दिया था और शायद अगली बार यह 2062 में दिखाई देगा.

स्वासमैंन- वैचमेन पुच्छल तारा 16 वर्ष और ओटेरेमा पुच्छल तारा 8 वर्ष की अवधि पर पृथ्वी से दिखाई पड़ता है.

धूमकेतु हमेशा के लिए टिकाऊ नही होते, लेकिन फिर भी प्रत्येक धूमकेतु के लौटने का समय निश्चित होता है.

क्षुद्र ग्रह तथा धूमकेतुओं की पृथ्वी से संभावित टक्कर को ध्यान में रखते हुए टारीनों तालिका की स्थापना की गयी है. इस तालिका की तुलना भूकंप की तीव्रता मापने वाले रिएक्टर तालिका से की जा सकती है.

सौर मंडल Saur Mandal Solar System in Hindi

 

उल्का या केतु (Meteors)

ये अंतरिक्ष में तीव्र गति से घूमते हुए अत्यंत सूक्ष्म ब्राह्मणलीय कण है. घूल व गैस से निर्मित ये पिण्ड जब वायुमंडल में प्रवेश करते हैं तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण कारण तेज़ी से पृथ्वी की ओर आते हैं तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण कारण तेज़ी से पृथ्वी की ओर आते हैं और वायुमंडल के साथ घर्षण द्वारा गर्म हो जाने पर प्रकाश की चमकीली घारी के रूप में दिखाई पड़ते हैं जो आकाश में क्षणभर के लिए चमकती हैं और लुप्त हो जाती हैं.

इसे टूटता तारा भी कहा जाता है. नवम्बर 2007 में खगोलविदों ने इसे लियोनिद की संज्ञा प्रदान की जाती है. अंतरिक्ष में 12-72 किमी/सेकेंड की औसत गति से परवलयाकार मार्ग में गतिशील उल्का को उल्का परमाणु कहा जाता है.

अधिकाँश उल्का परमाणु की उत्पत्ति सौरमंडल में ही होती है. ये सौरमंडल के सदस्य हैं ना कि अंतरतारक क्षेत्र से आने वाले पिण्ड है. सामान्य रूप से उल्का परमाणु 95 किमी की उंचाई पर उल्का बन जाता है. उल्का बनने की सर्वोच्च उंचाई 130 किमी है.

पृथ्वी के घरातल से 80 किमी की उंचाई तक पंहुचते पहुँचते लगभग सभी उल्का घर्षित होकर पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं. जब ऐसा उल्का नष्ट होकर ना होकर एक पिण्ड के रूप में पृथ्वी पर आ गिरता है, तब उसे उल्कापिण्ड या उल्काश्म कहते हैं.

पृथ्वी की सतह पर मिलने वाला सबसे बड़ा उल्कापिण्ड होबा वेस्ट है, जो नामीबिया के ग्रुटफोटीन के पास पाया गया है. जब कभी इलकापिण्ड आकाश में विखंडित होकर तीव्र आवाज़ करता है तब उसे बोलाइट कहते है.

पृथ्वी की सतह पर मिलने वाला उल्का का अवशिष्ट गोला ग्लासी पदार्थ टेक्टाइट कहलाता है.

पृथ्वी के घरातल पर भारी उल्कापिंडों के अरीजोना में विन्सलों के पास बैरिगर उल्कापातीय क्रेटर विश्व का सर्वाधिक प्रसिद्ध उल्कापाती क्रेटर है.

भारत में महाराष्ट्र प्रांत के बुलढाना जिले की लोनार झील भी एक उल्कापातीय क्रेटर झील है, जिसका व्यास 1.5 किमी तथा गहराई 100 मीटर है.

About Solar System

 

चंद्रमा (The Moon)

चंद्रमा पृथ्वी का एक मात्र प्राकृतिक उपग्रह है. यह सौरमंडल का पांचवां सबसे बड़ा उपग्रह है, इसे जीवाश्म ग्रह भी कहा जाता है.

चंदमा की सतह और उसकी आंतरिक स्थिति का अध्यान करने वाला विज्ञान चन्द्र- विज्ञान कहलाता है.

पृथ्वी की तरह चंद्रमा की उत्पत्ति संबंधी मत प्रस्तुत किये गये हैं. 1938 में सर जार्ज डार्विन ने सुझाया कि प्रारंभ में पृथ्वी व चंद्रमा तेज़ी से घूमते एक ही पिण्ड थे.

चंद्रमा की पृथ्वी से औसत दूरी 384400 किमी है. चंद्रमा की पृथ्वी से निम्नतम दूरी 363104 किमी तथा पृथ्वी से अधिकतम दूरी 406696 किमी है.

चंद्रमा का द्रव्यमान तथा घनत्व पृथ्वी की तुलना में कम है और इसका व्यास 3476 किमी है.

चंद्रमा अपने अक्ष पर 5 डिग्री झुका हुआ है. चंद्रमा का परिभ्रमण तथा परिक्रमण अवधि एक समान है जो 27 दिन 7 घंटे 43 मिनट है. यही कारण है कि चंद्रमा का सदैव एक ही भाग दिखाई देता है.

पृथ्वी के समान इसका परिभ्रमण पथ भी दीर्घ व्रताकार है. इसकी परिक्रमण गति 3700 किमी/ घंटा है. पृथ्वी से चंद्रमा का 57% भाग को देख सकते हैं. चंद्रमा का अक्ष तल पृथ्वी के अक्ष के साथ 58.48 डिग्री का कोण बनाता है.

चंद्रमा पृथ्वी के अक्ष के लगभग समानांतर है और इसका धरातलीय गुरुत्व पृथ्वी का 1/6 है तथा इसका पलायन वेग 2.38 किमी सेकेंड है और इसी कारण चंद्रमा पर पृथ्वी जैसा वायुमंडल नही है. वायुमंडल के अभाव के कारण चंद्रमा पर मौसमी तत्व जैसे- बादल, वर्षा व कुहासा का अभाव पाया जाता है. चंद्रमा का धरातल पृथ्वी की तुलना में अधिक ठोस है. इसकी भूपर्पटी पर ओक्सीजन तथा सिलिकेट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है.

इसके धरातल पर पर्वत, क्रेटर व घाटी की बहुलता है. अपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा लाये गये चट्टानों से पता चलता है कि चंद्रमा भी उतना ही पुराना है जितना पृथ्वी….लगभग 460 करोड़ वर्ष.

 

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निष्कर्ष

वैसे तो हमने यहाँ काफी सारे बिन्दुओं पर प्रकाश डालने की कोशिश की है और यक़ीनन बहुत से ऐसे टॉपिक हैं जो अभी हम यहाँ नही बता पाए हैं इसलिए मैं इस आर्टिकल को समय समय पर अपडेट करता रहूँगा ताकि सौर मंडल से रिलेटेड और भी जानकारी आपके साथ साझा कर सकूँ.

अगर आपको ये आर्टिकल सौर मंडल: अंतरिक्ष का अनोखा ज्ञान/ Saur Mandal (Solar System in Hindi) पसंद आया है तो कमेंट करके जरुर बताइएगा.

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3 Comments

  1. ANAND June 18, 2018
  2. HindiApni June 27, 2018

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