वैदिक सभ्यता: संस्कृति साहित्य और इतिहास

वैदिक सभ्यता संस्कृति साहित्य और इतिहास

वैदिक सभ्यता संस्कृति साहित्य और इतिहास

सिंधु संस्कृति के पतन के बाद भारत में जिस नवीन सभ्यता का विकास हुआ उसे वैदिक अथवा आर्य सभ्यता के नाम से जाना जाता है. भारत का इतिहास एक प्रकार से आर्य जाति का इतिहास है.

भारत में आर्यों की पहचान नार्डिक प्रजाति से की जाती है. आर्यों को लिपि का ज्ञान नही था, इसलिए वैदिक साहित्य को श्रुति साहित्य भी कहा जाता है, जिसका एक नाम संहिता भी है.

जर्मन वैज्ञानिक मैक्स मूलर ने आर्यों का मूल निवास स्थान मध्य ऐशिया में बैक्ट्रिया को माना है. भारतीय ग्रंथ ऋग्वेद व ईरानी ग्रंथ जिंद अवेस्ता में कई भाषायी समानता पाई जाती हैं.

 

ऋग्वैदिक काल (1500- 1000 ई.पू.)

 

वैदिक सभ्यता संस्कृति साहित्य और इतिहास

 

सिंधु सभ्यता नगरीय थी जबकि वैदिक सभ्यता मूलतः ग्रामीण थी. ऋग्वैदिक समाज का आधार परिवार था और परिवार पितृ- सत्तात्मक होता था.आर्यों का आर्थिक जीवन के लिए मूलभूत व्यवसाय कृषि व पशुपालन थे.

वेद

वेद विद धातु से बना है, जिसका अर्थ है ज्ञान. यह सूक्तों, प्रार्थनाओं, स्तुतियों, मंत्र- तंत्रों तथा यज्ञ सम्बन्धी सूत्रों के संग्रह हैं.

वेदों को संहिता भी कहा जाता है क्योंकि यह वेदव्यास ने संकलित किये थे . वेदों का एक नाम श्रुति भी है क्योंकि संकलित किये जाने से पूर्व यह गुरु- शिष्य परम्परा में सुनाये जाते थे.

 

वेदों की संख्या

ऋग्वेद- यह सूक्तों का संग्रह है

यजुर्वेद- यज्ञ संबंधी सूक्तों का संग्रह है

सामवेद- गीतों का संग्रह है, इसके अधिकांश गीत ऋग्वेद से लिए गये हैं.

अथर्ववेद- तंत्र- मन्त्रों का संग्रह है

 

ऋग्वेद

इसमें विभिन्न देवताओं की स्तुति में गाये गये मन्त्रों का संग्रह है.

रचना – सप्तसैंधव प्रदेश में हुई.

संकलनकर्ता – महर्षि कृष्ण द्वेयापन ( वेदव्यास)

विवरण – इसमें कुल 10 मण्डल, 1028 सूक्त तथा 10462 मंत्र हैं.

ऋग्वेद के ब्राहमण – ऐतरेय व कौशितीकी

आयुर्वेद को ऋग्वेद का उपवेद कहा जाता है. ऋग्वेद की सर्वाधिक पवित्र नदी सरस्वती थी. ऋग्वेद में यमुना का उल्लेख 3 बार व गंगा का उल्लेख 1 बार 10 वें मंडल में मिलता है.

ऋग्वेद में पुरुष देवताओं की प्रधानता है, जिसमें इंद्र का वर्णन सबसे अधिक 250 बार किया गया जबकि इंद्र को पुरंदर कहा गया है जिसका अर्थ है दुर्ग को तोड़ने वाला जबकि अग्नि देवता का 200 बार उल्लेख मिलता है.

ऋग्वेद की अनेक बातें अवेस्ता से मिलती है जो कि ईरानी भाषा का प्राचीन ग्रंथ है.

 

सामवेद

साम का अर्थ गान से है. सामवेद से ही सर्वप्रथम 7 स्वरों (सा…रे…गा….मा) की जानकारी प्राप्त होती है, इसलिए इसे भारतीय संस्कृति का जनक माना जाता है.

गंधर्ववेद सामवेद का ही उपनिषद है. पुराणों में सामवेद की सहस्त्र शाखाओं का उल्लेख है.

3 शाखाएं – कौथुम, राणायनीय, जैमिनीय

2 भाग – पूर्वार्चिक, उत्तरार्चिक

सामवेद के ब्राहमण – पंचविश, षड्विश, जैमिनीय, छान्दोग्य

 

यजुर्वेद

यजु का अर्थ यज्ञ होता है. इसमें यज्ञ की विधियों का प्रतिपादन किया गया है. इसमें यज्ञ बलि सम्बन्धी मन्त्रों का वर्णन है. यजुर्वेद गध्य और पद्य दोनों में लिखा गया है.

यजुर्वेद के 2 प्रधान रूप – कृष्ण यजुर्वेद

                             शुक्ल यजुर्वेद

शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी संहिता) को ही अधिकांश विद्वान वास्तविक यजुर्वेद मानते हैं. यजुर्वेद का अंतिम अध्याय ईशोपनिषद अध्यात्म चिंतन से सम्बंधित है.

शुक्ल यजुर्वेद का ब्राहमण ग्रंथ शतपथ व कृष्ण यजुर्वेद का ब्राहमण ग्रंथ तैत्तरीय है.

यजुर्वेद में हाथियों के पालने का उल्लेख है. धनुर्वेद को यजुर्वेद का उपवेद कहा जाता है. यजुर्वेद में सर्वप्रथम राजसूय तथा वाजपेय यज्ञ का उल्लेख मिलता है.

 

अथर्ववेद

अथर्ववेद को ब्रह्मवेद (श्रेष्ठ वेद) भी कहा जाता है. अथर्वा ऋषि के नाम पर इस वेद का नाम अथर्ववेद पड़ा.

अथर्ववेद का ब्राहमण गोपथ है इसमें याज्ञिक अनुष्ठानों का वर्णन नही है. अथर्ववेद में 20 अध्याय, 731 सूक्त व 6000 मंत हैं. इसमें वशीकरण, जादू- टोना, भूत-प्रेतों व औषधियों से संबद्ध मन्त्रों का वर्णन है.

अथर्ववेद में कुरु के राजा परीक्षित का उल्लेख है जिन्हें म्रत्यु लोक का देवता बताया गया है.

अथर्ववेद में मगध तथा अंग क्षेत्र में रोग फैलने की कामना की गयी है.

अथर्ववेद का उपवेद शिल्पवेद कहलाता है.

काशी का प्राचीनतम उल्लेख अथर्ववेद में ही मिलता है.

अथर्ववेद के मन्त्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को ब्रह्म कहा जाता था.

 

ऋग्वेद यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर में शामिल

भारत की सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद की 30 हस्तलिपियाँ यूनेस्को के मेमोरी ऑफ़ वर्ल्ड रजिस्टर (MOW) में संरक्षित करने हेतु 19 जून 2007 को शामिल किया गया. ये हस्तलिपियां पुणे स्थित भंडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टीट्यूट में हैं.

विश्व में दस्तावेजी विरासत के नष्ट होने के खतरे को देखते हुए यूनेस्को ने 1992 में MOW की स्थापना की थी. इसका मूल उद्देश्य यही है कि विश्व की कोई भी दस्तावेजी विरासत सभी की संपत्ति है, इसलिए उसका सही रख-रखाव और संरक्षण किया जाना चाहिए.

ऋग्वेद में आर्यों द्वारा प्रकृति और उसकी उदारता में की गयी प्राथनाएं शामिल हैं और 4 वेदों में सबसे पुराना यह वेद भारतीय संस्कृति का एक स्तम्भ है. ऋग्वेद की हस्तलिपियों को यूनेस्को के पास संरक्षित कराने के प्रयास किये गये हैं.

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यम- नचिकेता संवाद

कठोपनिषद में नचिकेता और यमराज के बीच प्रश्न- उतार द्वारा मृत्यु के बाद जीवन के ज्ञान का वर्णन है. नचिकेता ने यमराज से 3 प्रश्न किये थे. तीसरे प्रश्न के मूल में मरने के बाद क्या होता है…?? मरने के बड जीवन है या नही.. ?? क्या मृत्यु अंतिम सत्य है…?? क्या मृत्यु से बचा जा सकता है…?? इस तीसरे प्रश्न को उस बालक के मुख से सुन यमराज असमंजस में पास गये.

नचिकेता का अटल निश्चय देखकर उन्होंने उत्तर दिया जो इस जगत के सभी चराचर के लिए उत्तम ज्ञान है.

प्रत्येक पेड़- पौधे, पशु- पक्षी तथा मनुष्य में आत्मा तत्व है.आत्मा परमात्मा का अंश है. मनुष्य जैसा कर्म करता है उसके अनुसार फल प्राप्त करता है. कर्म के अनुसार आगे की यात्रा में विकास करता है.

 

जीवन के 2 मार्ग

प्रेय मार्ग – जो भौतिक भोगों में फंसा है वह प्रेय मार्ग है और जो अच्छे कर्म करता वह प्रेय मार्ग है.

श्रेय मार्ग – जो माता पिता व गुरु की आज्ञा का पालन करता है. ज्ञान अर्जन में लगा रहता है और भगवान् का भजन करता है, वह श्रेय मार्ग है. जो आत्मकल्याण के लिए अच्छे गुणों को जो अपनाता है, अच्छे कर्मों को करता है वह जीवन मृत्यु के बंधन से छुटकारा पाता है.

यमराज के द्वारा कहे कथन सिर्फ नचिकेता के लिए ही नही बल्कि सारे प्राणियों के लिए गूढ रहस्यमयी शिक्षा है, यह जीवन और मृत्यु के रहस्यों को स्पष्ट करती है.

 

ऋग्वेदिक भौगोलिक विस्तार क्षेत्र

प्राचीन आर्य लोग सप्त- सिंधु नाम के क्षेत्र में रहते थे, जिसका अर्थ 7 नदियों वाला क्षेत्र है. यह क्षेत्र मुख्यतया दक्षिण एशिया के उत्तर- पश्चिम क्षेत्र से लेकर यमुना नदी तक के क्षेत्र में फैला है. 7 नदियों में सिंधु, वितस्ता, असिकनी, परूष्णी, विपाशा, शुतुद्री, सरस्वती शामिल है.

परम्परानुसार आर्यों के 5 काबिले थे, जिनका समुदाय पंचजन कहलाता था, लेकिन और भी जन रहे होंगे. ये जन आपस में लड़ते थे और कभी कभी इसके लिए आर्योत्तर जनों का भी सहारा लेते थे. भारत और त्रित्सू आर्यों के शासक वंश थे और पुरोही वशिष्ठ दोनों वंशों के समर्थक थे. बाद में चलकर इस देश का नाम इसी भरत कुल के आधार पर भारतवर्ष पड़ा. इस कुल काबिले का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद में मिलता है.

भरत राजवंश का 10 राजाओं के साथ विरोध थे जिनमे 5 आर्यों- जनों के प्रधान और शेष आर्योत्तर जनों के थे. भरत और 10 राजाओं के बीच जो लड़ाई हुई वह दशराज युद्ध के रूप में विदित है. यह युद्ध परुष्णी नदी के तट पर हुआ, जिसकी पहचान आज की रावी नदी से की जाती है. इसमें सुदास की जीत हुई और इस प्रकार भरतों की प्रभुत्ता स्थापित हुई थी.

कुरु जनों ने पंचालों के साथ मिलकर उछ गंगा मैदान में अपना संयुक्त राज्य स्थापित किया था. यहाँ कुरु- पंचालों ने उत्तर वैदिक काल में बड़ा महत्व प्राप्त किया.

वैदिक काल व इतिहास

 

सती प्रथा- तथ्य एक द्रष्टि में

ऋग्वेद में इसका उल्लेख नही मिलता है. अथर्ववेद से सती प्रथा की औपचारिकता पूरी करने के लिए पत्नी अपने पति के साथ चिता पर लेटती थी.

सिंधु सभ्यता में सती प्रथा व पर्दाप्रथा नही थी. वैदिक समाज में भी सती प्रथा प्रचलित नही थी.

रामायण के मूल अंश में इसका उल्लेख नही है, किन्तु उत्तरकाण्ड में देव्वंती की माता के सती होने का उल्लेख है.

महाभारत में इस प्रथा का कम उल्लेख मिलता है, पांडू की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी माद्री सती हो गयी थी, जबकि अभिमन्यु, घटोत्कच तथा द्रोण की पत्नियाँ सती नही हुई थीं.

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सती प्रथा का कोई प्रमाण नही मिलता है किन्तु यूनानी लेखकों ने उत्तर-पश्चिम में सैनिकों की स्त्रियों के सती होने का उल्लेख किया है.

संगम काल में सती प्रथा का प्रचलन था जो विशेषकर उच्च सैनिक वर्गों में था.

कल्हण की राजतरंगिणी से सती प्रथा के अनेक उदहारण मिलते हैं. मुग़ल काल में अकबर ने सती प्रथा को रोकने का प्रयास किया किन्तु उसेसफलता नही मिली.

1929 ई. में भारत के गवर्नर लार्ड विलियम बैंटिक ने सती प्रथा को प्रतिबंधित करने के लिए क़ानून लागू करवाने में राजाराम मोहन राय ने सरकार की मदद की और सती प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया गया.

 

मनुस्मृति क्या है…??

यह स्मृतियों में सबसे प्राचीन व सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. इसे हिन्दुओं की प्रमाणिक विधि संहिता कहा जाता है. इसमें व्यापक विषय वस्तु का प्रतिपादन किया गया है.

स्रष्टि से आरम्भ करके मानव समाज के विकास तथा दैनिक जीवन के कर्तव्यों व मोक्ष तक के मार्ग का विवेचन भी मिलता है.

मनु को मानव जाती का पिता कहा गया है. उन्होंने जीवन की व्यवस्था के लिए अपने नियम दिए और सर्वप्रथम यज्ञ का आयोजन किये थे.

 

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