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महात्मा गाँधी: एक महान व्यक्तित्व/ Mahatma Gandhi Essay Biography in Hindi

महात्मा गाँधी Mahatma Gandhi Essay Biography in Hindi

महात्मा गाँधी: एक महान व्यक्तित्व/ Mahatma Gandhi Essay Biography in Hindi

जियो ऐसे कि जैसे तुम कल ही मरने वाले हो…..और सीखो ऐसे जैसे तुम हमेशा ही जीने वाले हो.

जब जब भारत वर्ष के महान विभूतियों की चर्चा होती है तब तब एक नाम अवश्य ही आता है जिसको भारत का इतिहास और लोग हमेशा ही याद रखेंगे.

भारत देश की मुद्रा पर किसी व्यक्ति का स्मृति चित्र (फोटो) दिखाई देना कोई मामूली बात नही है. अपने जीवन के आधे भाग को बिना किसी स्वार्थ के अपने देश की सेवा के लिए समर्पित कर देना इनकी महानता की पहचान कराता है.

महात्मा गाँधी जी के आदर्श और व्यक्तित्व इतने सुद्रढ़ हैं कि विदेशी लोग भी इनसे बहुत प्रभावित हुए हैं.

 

जन्म और शिक्षा

गांधीजी के पिता राजकोट के मंत्री थे, किंतु उनको धन जोड़ने का लोभ नही था इसलिए इतने ऊँचे ओहदे पर होते हुए भी वे अमीर नही थे. इनकी माताजी बड़ी साध्वी थीं.

वे पूजा-पाठ किये बिना भोजन तक नही करती थीं. उपवास की महिमा का ज्ञान गांधीजी को इनकी माताजी से ही मिला था.

इस धर्मपरायण माता- पिता के घर 2 अक्टूबर 1868 को पोरबंदर में गांधीजी का जन्म हुआ.

इनका बचपन पोरबंदर में ही बीता. गांधीजी बचपन में बहुत संकोची स्वभाव के बालक थे. घंटी बजते ही स्कूल पहुँच जाते और स्कूल की छुट्टी होते ही घर भाग आते.

उनको किसी भी व्यक्ति से मिलने में भी डर लगता था कि कोई उनका मजाक ना उडाये.

गांधीजी बचपन से ही सत्यनिष्ठ थे, माता-पिता के संस्कारों ने उन्हें पहले ही धर्मात्मा बना दिया था. सच्चाई के प्रति ये प्रेम जो बचपन से इनकी नस-नस में समा गया था और आजीवन भी उनके साथ रहा.

जिन दिनों ये हाई स्कूल में पढ़ते थे, शहर में एक नाटक कंपनी आयी और उनका नाटक राजा हरीशचंद्र के ऊपर था.

नाटक देखने के बाद गांधीजी के सपनों में भी राजा हरीशचंद्र ही दीखते थे. गांधीजी ने अपने जीवन में विजय भी सत्य के बल पर ही पायी.

गांधीजी हरीशचंद्र की द्रढ़ता से बहुत प्रभावित हुए, हरीशचंद्र की विजय ने उनके मन को विश्वास दिला दिया कि सत्य की विजय अटल है.

गांधीजी ने कई बार इसी कहानी को मन ही मन दोहराया और फिर निश्चय किया कि वह सत्य का साथ कभी नही छोड़ेंगे.सत्य के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों उन्हें पग भर भी पीछे नही कर पायीं.

गांधीजी जब तक जीवित रहे सत्य का पालन करते रहे. उन्होंने सत्य को यहाँ तक अपनाया कि वे सत्य के पुजारी बन गये और सत्य के असली रूप को पहचाना.

इसी सत्य की धुन में उनमें आत्म-विश्वास और द्रढ़ता थी. गांधीजी ने जीवन भर इसी सत्य का उपदेश दिया. वे कहते थे-

 

“साधारण रूप में सत्य का अर्थ केवल सच बोलना ही समझा जाता है, परंतु सत्य का विशाल रूप विचार, वाणी और आचरण तीनों में फैला हुआ है.

हम सच्चाई की बात सोचें, सच्ची बात कहें और सच्ची बात ही करें. सत्य के ना होने पर हमारे जीवन में रह ही क्या जाता है…??

सत्य तो परमात्मा का रूप है और बुरा काम या बुरा विचार असत्य है.

असत्य हमेशा मनुष्य को नीचे की ओर ही ढकेलता है, इसलिए हमें किसी भी हालत में चाहे कितनी भी रूकावटें क्यों ना आयें, सत्य को नही छोड़ना चाहिए.”

 

 

बाल गांधी के निर्मल आंसू

 

महात्मा गाँधी Mahatma Gandhi Essay Biography in Hindi

 

इस सत्यप्रियता ने इनको अनेक बार पाप के गर्त में गिरने से बचाया. कुसंगति में पड़कर इन्होने एक बार भाई का कर्जा चुकाने के लिए एक तोला सोना चुरा लिया था.

कर्जा तो निपट गया किंतु इनकी अंतरात्मा पश्चाताप की आग में जलने लगी. उन्होंने सोचा कि पिताजी के सामने दोष स्वीकार कर लें, किंतु इनकी जबान नही खुली.

अंत में उन्होंने एक चिठी पिताजी के लिए लिखी, जिसमें उन्होंने स्वयं अपना अपराध स्वीकार किया था.

गांधीजी ने सारी की सारी बात उसमें साफ़ साफ़ लिख दी और प्रतिज्ञा की कि वे भविष्य में कभी भी ऐसा अपराध नही करेंगे और गांधीजी ने अपनी इस भूल को खुद ही स्वीकार किया.

पत्र पढ़ते ही पिता की आँखें भर आयीं और गांधीजी भी खूब रोये. गांधीजी को डर था कि इनके पिताजी उनका दोष जानकर क्षमा नही करेंगें, क्योंकि वे उदार व सत्यप्रिय तो थे ही, किंतु क्रोधी भी थे.

फिर भी उन्होंने गांधीजी द्वारा खुद से दोष स्वीकार करने के बाद उन्हें ह्रदय से क्षमा कर दिया. तभी से गांधीजी ने ये शिक्षा ली कि प्रायश्चित का सबसे अच्छा उपाय शुद्ध ह्रदय से दोष स्वीकार कर लेना है.

 

पिताजी के आंसुओं में गांधीजी की सभी कमजोरियां उसी तरह बह गयी जिस तरह गंगा के निर्मल प्रवाह में जमीन का कूड़ा- करकट बह जाता है.

पन्द्रह वर्ष की उम्र में ही गांधीजी का ह्रदय निर्मल हो गया था, उनकी अग्नि परीक्षा हो चुकी थी.

अपनी आत्मकथा लिखते समय गांधीजी ने चोरी के लिए “अस्तेय” शब्द का प्रयोग किया है. उन्होंने खुद ही अपने उपदेशों में कहा है….

 

“हम सब थोड़ी बहुत चोरी जाने अनजाने में करते हैं. दुसरे की चीज़ को बिना आज्ञा ले लेना चोरी है.

मनुष्य कभी कभी अपनी चीज़ को भी चोरी करता है जैसे बच्चे को जताए बिना ही कोई बाप गुपचुप कोई चीज़ खा ले. सड़क पर पड़ी हुई चीज़ के भी आप स्वामी नही हो, उस पर भी सरकार का हक़ है. इसलिए चोरी छोटी हो या बड़ी, उससे बचना चाहिए.”

 

विलायत में ऊँची शिक्षा

 

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गांधीजी जब सोलह साल के थे, उनके पिताजी का देहान्त हो गया. उनकी पीढ़ियों से चली आयी दीवानगिरि की गद्दी को सँभालने के लिए गांधीजी को विलायत जाने की शिक्षा देना कुटुम्बियों ने जरुरी समझा.

गांधीजी भी विलायत जाने की इच्छा रखते थे, लेकिन माताजी को डर था कि लड़का विलायत जाकर मांस और शराब के चक्कर में फंस जाएगा.

तब गांधीजी ने प्रतिज्ञा की कि वे विलायत जाकर मांस, मदिरा और स्त्री से दूर रहेंगे. इस पर माताजी से इनको विलायत जाने की आज्ञा मिल गयी.

लन्दन पहुँच कर ये विक्टोरिया होटल में ठहरे, जहाँ इन्हें बिलकुल भी अच्छा नही लगा और फिर बाद में एक अंग्रेजी परिवार के साथ रह कर वहां की भाषा और रहन- सहन भी सिखा.

अपनी परीक्षा की तैयारी के साथ साथ इन्होने धर्मग्रंथो का भी अध्ययन आरम्भ कर दिया. गीता को अंग्रेजी में पढने के बाद इनकी श्रद्धा और बढ़ गयी और गीता के प्रति इनके मन की ये भावना जीवन भर रही.

 

उन्ही दिनों एक इसाई सज्जन की प्रेरणा से इन्होने बाइबिल भी पढ़ी. बाइबिल का यह वाक्य कि “जो तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे उसके आगे बांया गाल कर दे” इनके जीवन का पथप्रदर्शक बन गया.

 

दक्षिण अफ्रीका को प्रस्थान

तीन साल के अथक परिश्रम के बाद 10 जून 1891 में ये बैरिस्टर बन गये और 12 जून को इंडिया के लिए चल पड़े.

यहं आकर इनको अपनी माताजी के स्वर्गवास का समाचार मिला. गांधीजी ने लिखा है कि “पिताजी की म्रत्यु से ज्यादा आघात मुझे माताजी की म्रत्यु से पहुंचा”.

राजकोट में इन्हें वकालत करते हुए अभी ज्यादा समय नही हुआ था कि इनको दक्षिण अफ्रीका से बुलावा आ गया.

पोरबंदर की एक बड़ी कंपनी ‘अब्दुल्ला एंड कंपनी’ ने दक्षिण अफ्रीका के एक सौदागर से चालीस हजार पौंड लेने थे और दोनों में झगडा चल रहा था. गांधीजी अब्दुला एंड कंपनी की ओर से वकालत करने के लिए दक्षिण अफ्रीका की ओर रवाना हो गये.

यहाँ से इन्होने अपने जीवन के कार्यक्षेत्र में प्रवेश किया. व्यवसाय में प्रवेश करते ही इनको नई नई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा जहाँ इनके बचपन के संस्कारों ने इन्हें असाधारण बना दिया.

महात्मा गाँधी Mahatma Gandhi Essay Biography in Hindi

 

एक घटनापूर्ण यात्रा

जब अदालत में पहुंचे तो मजिस्ट्रेट ने कहा कि अपनी पगड़ी उतार लो, लेकिन इन्होने साफ़ इनकार कर दिया और बाहर चले गये.

यह घटना अखबारों में निकल गयी और इसकी खूब चर्चा हुई. किसी ने इनका समर्थन किया तो किसी ने इसे बदतमीजी कहा. ये बात इतनी ज्यादा फ़ैल गयी कि इनका नाम चार-पांच दिनों में ही दक्षिण अफ्रीका के हर एक की जबान पर था.

इसके बाद तो घटना पर घटना होने लगी.

गांधीजी ट्रेन के पहले दर्जे के डिब्बे में यात्रा कर रहे थे, तब एक अफसर ने आकर इनसे दुसरे डिब्बे में चले जाने के लिए कहा लेकिन ये नही गये, तो एक सिपाही ने आकर इनको धक्के देकर नीचे उतार दिया जिसके बाद ये उन जाड़े के मौसम में सारी रात वेटिंग रूम में ही बैठे रहे.

दुसरे दिन जब ये शहर गये तो अंग्रेज कोचवान ने भी इनके साथ दुर्व्यवहार किया और गुस्से में इनको पीटना भी शुरू कर दिया.

तभी पुलिस सुपरिंटेंडेंट की पत्नी वहां से गुजर रही थी जिन्होंने इनका बचाव किया.

जिसके बाद ये घर आये लेकिन इनके घर के बाहर लोगन की भीड़ जमा थी जो इनके खिलाफ नारे लगा रही थी.

इस समय इन्होने पुलिस कैप्टेन की मदद से बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाई. वेष बदलकर सिपाही की वर्दी पहनी और घर के पीछे से निकलकर थाने पहुँच गये.

अब इस घटना की चर्चा ब्रिटिश पार्लियामेंट तक पहुँच गयी जिस पर चेम्बर्लेन ने दक्षिण अफ्रीका के अधिकारीयों को तुरंत अपराधियों पर मुकदमा चलाने का हुक्म दिया, लेकिन गांधीजी ने मुक़दमे के लिए बिल्कुल ही मना कर दिया.

महात्मा गाँधी की जीवनी

 

दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह

 

महात्मा गाँधी Mahatma Gandhi Essay Biography in Hindi

 

भारत में आकर इन्होने मुंबई के गिरिगाँव में एक मकान लिया और वकालत शुरू करने का निश्चय किया. यहाँ आते ही इनका लड़का मणिलाल बीमार पड़ गया.

मुंबई में आये हुए उन्हें कुछ महीने ही हुए थे दक्षिण अफ्रीका से एक तार में सन्देश आया कि चेम्बर्लेन यहाँ आ रहे हैं आपको शीघ्र ही यहाँ आना चाहिए और ये जल्दी ही दक्षिण अफ्रीका चले गये.

वहां जाकर ये चेम्बरलेन से मिले लेकिन दक्षिण अफ्रीका के क़ानून में कोई भी बदलाव नही हुआ, जिसके लिए इन्होने सत्याग्रह का हथियार उठाया.

दक्षिण अफ्रीका सरकार के भारतीय विरोधी आर्डिनेंस के प्रति विरोध प्रकट करने के लिए इन्होने 11 सितम्बर 1906 को एक सभा बुलाई गयी जिसमें यह प्रस्ताव पारित हुआ कि भारतियों को अफ्रीका के इस बिल के आगे सर नही झुकाना चाहिए, बाद में इसी का नाम सत्याग्रह पड़ा. गांधीजी को इसके लिए दो महीने की सजा भी हुई.

दक्षिण अफ्रीका की जेल बड़ी भयानक थी, यहाँ जेल की कोठरियों के दरवाजे में लोहे की छड़ें नही थीं बल्कि दरवाजे ठोस लोहे के थे. हवा के लिए दीवार में सिर्फ एक ही झरोखा था.

इनके बाद जेल में सत्याग्रह के आन्दोलनकारी भी आने लगे जिसके बाद जनरल ने इन्हें मिलने के लिए बुलाया और काला क़ानून को बंद करके सभी कैदियों को छोड़ दिया गया.

लेकिन बाद में जनरल ने फिर से काला क़ानून लागू कर दिया जिससे गंदिजी को फिर से सत्याग्रह का युद्ध शुरू करना पड़ा.

यह सत्याग्रह बहुत चला जिसमें हजारों भारतीय जेल भी गये. भारत से माननीय गोखले भी दक्षिण अफ्रीका गये जिनके सुझाव से जनरल ने इंडियन रिलीफ बिल स्वीकार किया जो गांधीजी के सत्याग्रह की विजय थी.

इस सत्याग्रह ने गांधीजी का नाम दुनिया भर में प्रसिद्ध कर दिया.

 

ब्रह्मचर्यं का व्रत

दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह करते हुए गांधीजी ने दो-तीन व्रत ऐसे लिए जिनका उनके जीवन पर स्थायी प्रभाव रहा, जिसमें पहला व्रत जीवन भर ब्रह्मचारी रहने का था, जो कि उन्होंने 1906 ई. में लिया था.

गांधीजी ने महसूस किया कि लोक सेवा के किसी भी काम के लिए ब्रह्मचर्यं अनिवार्य है.

गांधीजी ने स्वयं अपनी आत्मकथा में लिखा है कि “बुढ़ापे में भी ब्रह्मचारी रहना कितना कठिन काम है ये मैं जानता हूँ, दिन-प्रतिदिन मुझे ये महसूस होता जा रहा है कि इस व्रत के पालन करना तलवार की धार पर चलना है”.

बड़े बड़े ऋषि मुनि भी इस व्रत को निभाने में असमर्थ रहे थे लेकिन गांधीजी का आत्मबल उन ऋषियों से कही ऊँचा था.

व्रत लेने से पूर्व गांधीजी ने अपनी पत्नी से सलाह नही की थी. व्रत लेने के बाद इन्होने उनसे सलाह मशवरा किया और कस्तूरबा ने भी इस व्रत में कोई आपत्ति नही की.

इस व्रत के बाद गांधीजी ने अपना गृह-जीवन बिलकुल सादा बना लिया.

 

दूध और नमक का त्याग

 

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गांधीजी ने यह भी अनुभव किया कि दाल और नमक के त्याग से भी ब्रह्मचर्यं का पालन में सहायता मिलेगी, इन्होने तुरंत नमक और दाल का परित्याग कर दिया.

दूध के संबंध में भी गांधीजी को यह विश्वास हो गया कि दूध ब्रह्मचर्यं का शत्रु है, दूध से विकार पैदा होते हैं.

उन दिनों इन्होने यह भी पढ़ा था कि ग्वालों द्वारा भैसों पर अत्याचार होता है, इसलिए इन्होने दूध छोड़ने का भी व्रत लिया.

दूध छोड़ने के व्रत में आपको तब ढील करनी पड़ी जब ये भयंकर पेचिश से पीड़ित थे.

 

स्वदेश आगमन

दक्षिण अफ्रीका में 11 साल बिताने के बाद ये फिर स्वदेश के लिए रवाना हुए. मुंबई से पूना आने के बाद ये गोखले से मिले जिन्होंने गांधीजी से आग्रह किया कि आप उनकी “भारत सेवक समिति” के सदस्य बन जाएँ, किंतु आपने उस समिति के आदर्शों से असहमत होने के कारण सदस्यता स्वीकार नही की.

गुजरात से भी इनको कई नियंत्रण आये, लेकिन अंत में इन्होने अपनी जन्मभूमि गुजरात में ही अपने आश्रम की स्थापना की.

 

आश्रम की स्थापना

आश्रम का नाम रखा गया “सत्याग्रह- आश्रम”. 35 सदस्यों के प्रवेश के साथ अहमदाबाद से कुछ दूर साबरमती नदी के किनारे आश्रम की नींव रखी गयी.

आश्रम के नियम बड़े कड़े थे, सुबह चार बजे उठकर सम्मिलित प्राथना होती थी और गीता पाठ होता था, फिर गांधीजी प्रवचन करते थे.

आश्रम की रसोई में जो भोजन बनता था उसमें मसाला- मिर्च नही पड़ता था. हरिजन लोग भी सबके साथ बैठकर खाना खाते थे.

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सत्याग्रह की योजना

जब अंग्रजी सरकार ने भारतियों की सेवाओं का पुरूस्कार रोलेट क़ानून के रूप में देने का निश्चय किया तो गांधीजी अंग्रेजों की इस हरकत पर चौक गये.

उन दिनों ये अहमदाबाद में ही थे और बल्लभ भाईजी से भेंट होती रहती थी.

इसके विरोध में इन्होने जल्दी ही सत्याग्रह का प्रतिज्ञा-पत्र तैयार करवाया और उस पर बल्लभ भाई और सरोजिनी नायडू के भी हस्ताक्षर हुए.

रोलेट बिल कि धारा सभा में पेश होने के बाद ये वायसराय से मिले और कई बार उनको पत्र भी लिखे, लेकिन इस बार उनकी कोई भी सुनवाई नही हुई, जिसके विरोध में इन्होने आन्दोलन शुरू किया.

उन दिनों गांधीजी का स्वास्थ्य सही नही था फिर भी इन्होने भारत भर में घूम कर हलचल शुरू कर दी.

मद्रास में गये तो श्री गोपालाचार्य से इनकी भेंट हुई जिनके साथ मिलकर सत्याग्रह की योजना को काफी बल मिला. क़ानून का सविनय भंग किस तरह हो सकता है, इस विषय पर भी काफी चर्चा हुई.

जब ये मद्रास में थे तभी इन्हें सूचना मिली कि रोलेट बिल अब क़ानून बन गया है, तो सारी रात इन्हें नींद नही आयी.

सवेरे ही श्रीगोपालाचारी को बुला कर उन्होंने इस क़ानून के विरोध में सारे देश में हड़ताल मानाने का फैसला लिया.

आखिर 30 मार्च 1919 के दिन हड़ताल के लिए दिन की घोषणा की गयी, लेकिन बाद में इसकी तिथि परिवर्तित कर दी गयी, किंतु दिल्ली में तो 30 मार्च को ही हड़ताल शुरू हो चुकी थी.

वहां सरकार ने हजारों लोगों को गोलियों से भून डाला था. लाहौर और अम्रतसर में भी ऐसे ही गोलीकांड हुए. मुंबई में 6 अप्रैल को गांधीजी की उपस्थिति में हड़ताल मनाई गयी, जहाँ इन्होने भाषण भी दिया और “सविनय अवज्ञा भंग” की भी घोषणा की.

7 अप्रैल की रात हो ही ये दिल्ली के लिए चल पड़े. दिल्ली के पास एक स्टेशन पलवल पर एक पुलिस अफसर ने सरकार का ये हुक्म दिखाया कि पंजाब की सीमा में दाखिल मत होओ, लेकिन इन्होने इस आज्ञा को मानने से इनकार कर दिया.

 

हिमालय जैसी भूल

मुंबई में आकर इन्हें मालूम हुआ कि अहमदाबाद में भी खून- खराबा हुआ है और वहां मार्शल लॉ जारी था, लोग डरे हुए थे.

इस रक्तपात का पश्चाताप के लिए इन्होने तीन दिन का उपवास रखा. इन्होने सत्याग्रह को भी बंद करने का निर्णय लिया और सत्याग्रह शुरू करने को “हिमालय जैसी बड़ी भूल” स्वीकार किया.

यह भूल इन्हें और बड़ी मालूल होने लगी जब इन्होने दिल्ली के हत्याकांडों और अमृतसर का जलियांवाला बाग़ हत्याकांडों के बारे में सुना. ये पंजाब जाकर अपनी आँखों से सब देखना चाहते थे लेकिन सरकार ने इसकी इजाजत नही दी.

जब इनको इजाजत मिली तो ये पंजाब जाकर मालवीयजी, स्वामी श्रदानंद और मोतीलालजी से मिले.

 

कांग्रेस में प्रवेश

जांच- समिति की इतनी सुंदर रिपोर्ट लिखने के बाद लोकमान्य तिलक, मालवीयजी और मोतीलालजी को इनकी वैधानिक योग्यता पर पूरा भरोसा हो गया और गांधीजी को कांग्रेस की नई व्यवस्था बनाने का कार्य सौंपा गया.

कांग्रेस का नया विधान बनाने का काम गांधीजी ने अपने ऊपर लिया. उस समय जो इन्होने कांग्रेस का विधान तैयार किया वही कांग्रेस का विधान बन गया.

कांग्रेस में प्रवेश करने के बाद कांग्रेस इनकी प्रयोगशाला बन गयी. जिस तरह उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के हथियार से धर्मयुद्ध में विजय पायी थी, उसका प्रयोग भारत में भी किया.

1919 से 1947 तक 28 वर्षों का देश का इतिहास गांधीजी के प्रयोगों का ही इतिहास है.

1920 में कलकत्ता- कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ जिसमें इन्होने असहयोग का प्रस्ताव रखा. हजारों विद्यार्थियों ने स्कूलों का त्याग किया, हजारों वकील वकालत छोडकर देशसेवक बन गये.

किसानों में भी जाग्रति आयी और सरकार को लगान ना देने का निश्चय किया. जगह जगह सरकार की जनता से मुठभेड़ हुई. गोरखपुर जिले के चोरी-चौरा गाँव में तो बवाल हो गया.

सिपाहियों के अत्याचारों से तंग आकर कुछ लोगों ने दो-चार सिपाहियों को जिन्दा ही आग में फैक दिया. गांधीजी इस समाचार से बहुत दुखी हुए क्योंकि वे सत्याग्रह को हमेशा हिंसा से दूर ही रखना चाहते थे.

इस बात से इनको अहसास हुआ कि जनता ने उनके संदेश को सही से समझा नही और इन्होने तुरंत ही सत्याग्रह को बंद करने की घोषणा कर दी.

इस घोषणा से देश के हजारों देशभक्तों को निराशा हुई क्योंकि हजारों विद्यार्थी स्कूल छोड़कर बाहर निकल आये थे और उनका भविष्य अंधकारमय हो गया था, किंतु गांधीजी अपने फैसले पर अडिग रहे.  

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भारत में पहली जेल यात्रा

सत्याग्रह स्थगित हो गया था, किंतु सरकार के विरुद्ध लड़ाई जारी थी. कोई भी असफलता गांधीजी को कमजोर नही बनाती थी, बल्कि प्रत्येक पराजय से नई शिक्षा लेकर ये नए उत्साह से अपने मार्ग पर चल पड़ते थे और हर हार जीत का नया संदेश लेकर आती थी और अब ये जनता को सरकार के विरुद्ध नई लड़ाई की तैयार करने में लग गये.

जिससे सरकार की चिंता बढ़ गयी और इनको गिरफ्तार कर लिया गया. जज ने इनको 6 साल की जेल कैद का हुक्म दिया, भारत में आकर ये पहली बार था जब ये जेल गये.

इनके जेल जाने के बाद सरकार को हिंदू- मुस्लिम लड़ाई करवाने का बेहतर मौक़ा मिल गया और अब जगह जगह दंगे होने लग गये. जेल की सजा पूरी होने से पहले ही सरकार को इन्हें जेल से रिहा करना पडा.

जेल में रहकर इनके पेट में एक बड़ा फोड़ा हो गया था जिसके ऑपरेशन के लिए इनको छोड़ना पड़ा और साथ ही सरकार को इस बात का भी डर था कि अगर गांधीजी को जेल में कुछ हो गया तो जनता भयंकर विद्रोह कर देगी अंग्रेजी सरकार के खिलाफ.

जब ये जेल से छूटे तो देश में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे….हिंदू और मुसलमान एक दुसरे के खून के प्यासे हो रहे थे.

तब इन्होने इनको रोकने के लिए 21 दिन का दिल्ली में उपवास की घोषणा की, जिसके बाद दोनों पक्षों के नेता इनके पास आये और लड़ाई को रोकने का फैसला लिया.

 

राष्ट्रपति के पद पर

1924 में ये जेल से छुटकर दिसम्बर में कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये, जिसके बाद इन्होने देश का दौरा किया और चितरंजनदास स्मारक के लिए दस लाख रूपए इकठे किये.

देश के कोने कोने में भ्रमण करने के बाद ये इसी निश्चय पर पहुंचे कि देश को संगठित किये बिना सत्याग्रह में सफलता नही मिलेगी.

देश को संगठित करने के लिए इन्होने दो रचनात्मक कार्य शुरू किये: चर्खा और हरिजन सेवा.

 

हरिजन सेवा

हरिजनों को अलहदा प्रतिनिधित्व देने के विरुद्ध अनशन के बाद आपने हरिजनों के लिए काम करने का संकल्प लिया, इसलिए स्वास्थ्य ठीक होते ही ये 1933 को हरिजनों के दौरे करने के लिए निकल पड़े.

गांधीजी ने 8 लाख रूपए इकठे किये और ‘हरिजन सेवा संघ’ की स्थापना की.

 

महायुद्ध के बाद

1939 में महायुद्ध की घोषणा के बाद गांधीजी को फिर से राजनीति में भाग लेना पड़ा. भारत से परामर्श के बिना ही ब्रिटिश सरकार ने भारत की ओर से युद्ध की घोषणा कर दी.

कांग्रेस मंत्रीमंडलों ने इस प्रश्न पर प्रांतीय सरकारों को इस्तीफे दे दिए. कांग्रेस ने अंग्रेजी सरकार से फिर से पूर्ण स्वाधीनता की मांग की लेकिन सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया.

गांधीजी ने फिर से देश की बागडोर अपने हाथों में ले ली. 9 अगस्त 1942 को ‘भारत से चले जाओ’ का प्रस्ताव कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया और सरकार ने इसका उत्तर 9 अगस्त को सभी नेताओं की गिरफ़्तारी से दिया.

पूरे देश में आग सी लग गयी, ये स्वाधीनता का अंतिम युद्ध था. उन दिनों विश्वयुद्ध की चिंगारियां देश की सीमा को छू रही थीं.

जापान और जर्मनी में श्रीसुभाष की वाणियाँ बड़े चाव से सुनी जाती थीं. अंग्रेजी साम्राज्य अपने जीवन की अंतिम सांस ले रहा था.

चर्चिल ने सुलह के लिए भेजा था, किंतु युद्ध का पासा पलटते ही उसे वापस बुला लिया. सारे नेता जेल में नजरबंद थे.

जेलयात्रा के पहले सप्ताह में ही 15 अगस्त 1942 के दिन महादेवभाई का स्वर्गवास हो गया. इसके बाद 22 फरबरी 1943 को कस्तूरबा ने भी देहत्याग कर दिया.

कस्तूरबा का शव जब अर्थी पर डाला गया तो पहली बार गांधीजी की आँखों में बेबसी के आंसू थे.

1944 में जब गांधीजी जेल से बाहर आये तो उन्होंने देखा कि पूर्ण स्वाधीनता के मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट मि. जिन्ना थे. जिन्ना ने मुसलामानों के लिए ‘पाकिस्तान’ बनाने की मांग की.

गांधीजी खुद जिन्ना से मिलने मुंबई गये और उन्होंने जिन्ना को समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन जिन्ना टस से मस नही हुए.

आखिर में हारकर देश के नेता भारत को दो भागों में खंडित करने को राजी हो गये. गांधीजी इस फैसले के विरोधी थे लेकिन अपने नेता अनुयाइयों के आग्रह के विरुद्ध उन्होंने आवाज़ नही उठाई.

2 सितम्बर 1946 को अंतिम सरकार बनी. कलकत्ता में इस मंत्रिमंडल के विरुद्ध मुसलमानों ने जो प्रतिवाद किया उसमें भयंकर रक्तपात हुआ.

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नोआखाली यात्रा

कलकत्ता की चिंगारियां नोआखाली तक भी पहुंची और मुसलमानों ने नरमेघ शुरू कर दिया तब नोआखाली के हिन्दुओं की चीत्कार से सारा देश दहल उठा.

गांधीजी ने नोआखाली जाकर इस दानवी आग को शांत करने का निश्चय किया.

15 अगस्त 1947 के दिन जब भारत के बड़े बड़े शहर अगणित दीपों से जगमगा रहे थे, गांधीजी उजड़े हुए नोआखाली की एक अँधेरी कुटी में बैठे हुए थे और उनके अंदर स्वतंत्रता की ख़ुशी नही बल्कि हिंदू मुसलमान के झगडे की दुखद छवि थी.

नोआखाली के दृश्यों ने इन्हें गहरी वेदना में धकेल दिया.

15 अगस्त के आज़ादी दिवस के साथ पंजाब का ज्वालामुखी भी फूट पड़ा. पंजाब की आग शांत करने के लिए ये नोआखाली से पंजाब गये, किंतु इनके दिल्ली आने तक दिल्ली की गलियां भी खून की होली खेल रही थीं.

गांधीजी के रहते हुए जब दिल्ली का रक्तपात शांत नही हुआ तो इन्होने अनसन का व्रत शुरू किया और तीन-चार दिन के अनसन के बाद ही दिल्ली के दंगे धीरे धीरे बंद हो गये.

पंजाब से लाखों लोग दिल्ली आते थे और अपने दुखों की कहानी सुनाने गांधीजी के पास आते थे.

 

महाप्रयाण

प्रतिदिन इनकी सभा में हजारों लोग उपस्थित रहते थे. नई दिल्ली में विरला निवास के बाहर बगीचे में प्रार्थना होती थी.

इनके शांतिमय उपदेशों से कुछ धर्मार्थ हिंदू हो गये और इनकी हत्या की योजना बनायीं. इस योजना के अनुसार मदनलाल नाम के युवक ने एक दिन बम का गोला प्रार्थना सभा में फैका, लेकिन ये गोला पूरी तरह से फटा नही.

सरदार बल्लभ भाई पटेल ने गांधीजी से आग्रह किया कि अब वो प्रार्थना सभा में ना जाएँ. धमकियों के पत्र बी इनको मिलने लगे लेकिन ये विचलित नही हुए.

30 जनवरी 1948 की शाम को लगभग 6 बजे एक युवक नाथूराम गोडसे ने प्रार्थना सभा में जाकर तीन गोलियां इनके सीने से पार कर दीं. मुख से तीन बार ‘राम’ नाम लेने के बाद इन्होने अपने प्राण त्याग दिए.

गांधीजी के बलिदान का समाचार सारी दुनिया में गहरे दुःख के साथ सुना गया. सभी देशों की सरकारों ने शोक व्यक्त किया और सभी देशों के प्रमुख व्यक्तियों ने इनको श्रदांजलि भेंट की.

दिल्ली के पास यमुना तट पर इनका शवदाह हुआ और शवयात्रा का जुलूस मीलों लंबा था.

गांधीजी का देह अग्नि को समर्पित हो गया और इनकी आत्मा का संदेश आज भी भारत का पथ प्रदर्शन कर रहा है.  

 

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Excerpt from the Book: महात्मा गाँधी – सत्यकाम विधालंकार, राज्यपाल एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली

उम्मीद करता हूँ कि आप सभी को ये आर्टिकल “महात्मा गाँधी Mahatma Gandhi Essay Biography in Hindi” पसंद आया होगा.

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One Response

  1. ANAND April 30, 2018

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